एक सोच देश -हित में


क्यों दबी सी है एक आवाज़ ,जिसे गूँजना चाहिए

है ये मौन क्यों अज़ीब सा,  बूझना चाहिए।

एक सैलाब सा उमड़ा और बहा ले गया, घरौंदे अमन -चैन के

कोई तो इंतज़ाम, सूझना चाहिए।

विरोध हो ग़लत का तो सराहना

सही का विरोध, रोकना चाहिए।

बढ़ रही है आग क्यों ,जाति -धर्म भेद की

देश क्या और किनसे है , कुछ तो सोचना चाहिए।

है देश का वज़ूद और नाम, साथ हैं जब हम सभी

बिखर गए तो भारत नहीं,अलग जाति -धर्म के बस समूह कहलाऐंगे।

फूँक रहे  देश की संपत्ति जो, विद्रोह  के नाम पर

 मंसूबों  से उन्हें क्षुद्र स्वार्थ त्यागना चाहिए।

 मिट जायेंगे द्वेष -भाव सभी दिल से

मानवता को व्यवहार में अपनाना चाहिए।

देश की अखंडता के लिए धर्म -जाति में नहीं

एकता-सूत्र में बंधना चाहिए।










































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