'अम्मा का दुलार '



मिट्टी के उस आँगन में चूल्हे के पास बैठी हुई मेरी अम्मा

के हाथों  में थमे थे चकला - बेलन, जिनसे

 हर बार गोल रोटी बनकर मेरी थाली में आती थी।

मुख पर लगी जूठन को जब अम्मा अपनी साड़ी के पल्लू से हटाती थी ,

उसके मैले -कुचैले पल्लू में  भी ममता की ख़ुशबू नज़र आती थी।

अपनी गोद में बिठाकर उसका निबाले खिलाना

वो गोद अम्मा की जन्नत नज़र आती थी।

साग की कटोरी में मक्ख़न ढेर सारा

खाना जब भी खिलाती थी वो यशोदा  बन जाती थी

वो सबसे अलग थी ,अनूठी थी ,न्यारी थी

उसकी डाट भी मधुर गीत सी लुभाती थी।

ये उसकी ममता ,उसका दुलार ही  तो था  जो

होकर सयानी भी मै बच्ची ही कहलाती थी।


-अंशु  चौहान


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