वक़्त से शिक़ायत



कितना धीमे -धीमे चलते हो तुम, दुःख के हर दिन में कछुए की भाँति

सुख के हर दिन में तुम्हारी ,चाल खरगोश सी हो जाती है 

एक गति बढ़ाए नहीं बढ़ती ,दूसरी थामे नहीं थमती है | 

सारी दुनिया को वश में करके ,ख़ुद निरंकुश हो जाते हो 

मन की मर्ज़ी चले न आगे, जैसे चाहे नचाते हो | 

मनमानी चालों पर सबकी, तुम लगाम लगाते हो 

बड़ा न तुम से कोई जग में ,अहसास सहज दिलाते हो |

कभी दर्द दे जाते तुम ही, मरहम भी ख़ुद ही लगाते हो 

डर ,साहस ,सौंदर्य ,राग सब मुट्ठी में भर कर लाते हो 

जाने क्या है लेखा -जोखा कहाँ ,कब ,क्या छोड़  चले जाते हो | 

कोई शूरवीर नहीं ऐसा ,तुम्हें क़ाबू कर पाया हो 

तुम्हें हराकर इस सृष्टि में, जो विजयी बन पाया हो | 

इतनी सी बस है शिकायत ,दुःख के लम्हे कम कर दे 

सुख की अवधि किसी तरह भी ,बस थोड़ी लम्बी कर दे | | 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'