'दुविधा' .


बड़ी  दुविधा सी रहती है हर वक्त ,ये निर्णय नहीं ले पाती कि सांसारिक जीवन  की  सफलता को  उद्देश्य  रखूँ  या आध्यत्मिक .सुनती और पढ़ती तो  यही  आई  हूँ  अक्सर  कि  मनुष्य जन्म बड़ी  मुश्किल  से  मिलता  है,इसे ईश्वर प्राप्ति में लगाना  चाहिए . किसी से मोह  नहीं रखना  चाहिए .लेकिन सांसारिकता के  लिए  मोह  मुझे  लगता है थोड़ा तो  ज़रूरी है .किसी  भी क्षेत्र में सफल होने के लिए उसके प्रति मोह की  ज़रूरत तो  रहेगी ही .मोह के  वशिभूत  होकर  ही हर  व्यक्ति  रिश्ते निभा रहा है .हर  कर्म कर  रहा है.जिस दिन निर्लिप्त भाव  से  कोई ये  कर्म और दायित्व निभाएगा उसी  दिन  से वह योगी और आध्यत्मिक कहलाएगा  .सफलता ,नाम,शोहरत  इन सब  चीजों के प्रति मोह ,ये ही तो सांसारिकता के लक्षण हैँ .इंसान जब  हर  तरह का  मोह ,इच्छाएँ त्याग  देता  है  तभी अध्यात्म से और  ईश्वर  से जुड़  पाता  है .आध्यत्मिकता  और  सांसारिकता  कभी  साथ  नहीं  चल  सकती .अब  असली  सफलता  तो सांसारिकता और  मोह  से  विलग  होने  में  ही  है.  तो क्या ये सारी  दुनिया जो अपने -अपने क्षेत्र में दौलत -शोहरत कमाकर खुद  को सफल  मान  बैठी  है , वास्त्विकता  में  एक  भ्रम  में जी  रही  है ?सत्य  तो  ये  है  कि  हम  सभी जिस उद्देश्य से इस पृथ्वी पर आए हैं उस उद्देश्य को  विस्मृत  कर चुके  हैँ, और  सांसारिक उपलब्धियों को  ही जीवन  का  अंतिम लक्ष्य मान बैठे  हैँ जो  कि सत्य  नहीं  है .ठीक  है  लेकिन  जब  तक सांसारिकता से  मोह  का  चश्मा  नहीं  हटता तब  तक  उलझे  रहो  इसी  में ,आप  सब  भी और  मैं भी . मानते रहो इसे ही ज़िन्दगी का अंतिम  लक्ष्य..... ??

-अंशु चौहान

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