हम उलझ गए बस (poem)







हम उलझ गए बस

मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारे में

ना राम लड़े ,ना अल्लाह लड़े ,ना

नानक  किसी  ज़माने  में .

विवाद ,कलह ,द्वेष ,प्रतिशोध  के

भाव  भरे बस मानव  में ,

ईश्वर का कोई राग नहीं है खुद

को पूजे  जाने  में .

प्रेम ,दया ,सदभाव धरे हैं जिस

मन  के शुभ -आँगन में ,

राम बसे ,अल्लाह बसे ,सर्व- ईश  (एक ईश्वर )बसा उसी

हृदयालय में .

देश -प्रेम ,सर्व -हित चरम का

भाव धरे जो मानव उदार -मन 

पावन  में ,

बिन मस्जिद ,मंदिर ,गुरुद्वारे ,प्रभु 

उत्सुक हों ,वहीं  बुलाए  जाने  में .

अखंड देश की बात करें  और 

सदभाव बहे  हर  धारा  में ,

रक्त बहा कर  हिंसा से कब 

प्रसन्न हुए, ईश्वर पूजे  जाने  से .

-अंशु चौहान

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