'संकल्प अधूरे पूरे हों '(poem)











संकल्प अधूरे पूरे हों ,मैं ऐसा मानस चाहती हूँ
हर बार मने नव वर्ष यूँही ,पर नयी सोच भी चाहती हूँ
वादों की कच्ची डोर न हो ,नव सृजन रहित कोई भोर ना  हो
ऊर्जावान ,सुखद जीवन हेतु मैं ,अथक परिश्रम चाहती हूँ
दुःख ,शोक ,काश सब भाव नष्ट हों ,
आह्लादित मन की कपट रहित ,पावन सी चितवन चाहती हूँ
फुटपाथों पर कोई सुबह -शाम न गुज़रे,न हाथ कटोरे खाली हों
याचक ना किसी गृह समक्ष खड़ा हो,दाता स्वं प्रभु बलशाली हो
नीर बहे जब भी आँखों से ,खुशियों की जल धार बहे
निर्वासन हो पाप अधर्म का ,सत्य ,धर्म का ठौर रहे
आँखों में सपने बड़े - बड़े हों,पर मन में बचपन बना रहे
न बचपन का कोई मोल -भाव हो,निर्भीक मस्ती में उड़ा करे
नारी की अस्मत हो सुरक्षित ,साहस में रानी लक्ष्मी बनी रहे
नए साल की नई उमंगें ,बस आजीवन  मन में बनी रहें |
-अंशु चौहान 

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