"उसे भी हक है "(कविता)
उसे भी हक है खुलकर खिलखिलाने का
के उसकी सांसे भी ग़मों से बोझिल होती हैं
उसे भी हक़ है बिन बताए बाहर जाने का
के उसकी सीमायें भी विवशता से बंधी होती हैं
उसे भी हक है सबसे पहले खाने का
के उसके साथ भी दवाईयों की पर्चियाँ जुड़ी होती है
उसे भी हक है बारिश में नहाने का
के उसकी तमन्नाएं भी सावन से जुड़ी होती हैं
उसे भी हक है ज़ोर से बातें करने का
के उसकी खामोशियां भी शोर से जुड़ी होती हैं
उसे भी हक है आकाश में उड़ने का
के उसकी हिम्मतें भी परों से जुड़ी होती हैं
उसे भी हक है नदियों सा गुंगुनाने का
के उसकी मन तरंगें भी लहरों से जुड़ी होती हैं
उसे भी हक है बहुरूपी पोशाकों का
के उसमें भी अल्लहड़ सी छवि छुपी होती है
उसे भी हक है पुरूष से भिड़ जाने का
के उसमें भी 'दुर्गा' सी शक्ति छुपी होती है
उसे भी हक है विरोध हित डट जाने का
के उसकी स्वतन्त्रता भी अधिकारों से जुड़ी
होती है.
-अंशु चौहान

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed