'अल्फाजों को मुक्त कर दिया हमने'


सुबक कर भीगी आँखों से,अब लिखता होगा कुछ,

कैसे पत्थर को नम कर दिया हमने 

उसको होशियारी में जीना था,हमारी नादां सी फितरत थी,

वो दिमाग में उलझा था, हम पर दिल की हुकूमत थी 

कैसे बुद्धि को, दिल से कम कर दिया हमने,

अल्फ़ाज़ों को मुक्त कर दिया हमने,

दिल जज़्बातों से युक्त कर दिया हमने 

गुरूर ये था कि झुकना नहीं है,

किसी ज़ज्बाती के हाथों बिकना नहीं है 

कैसे मगरूर को अरहम कर दिया हमने

अल्फाजों को मुक्त कर दिया हमने

दिल जज़्बातों से मुक़्त कर दिया हमने 

-अंशु चौहान            

  




      


 




   



      


 




   



      

 


   

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