आध्यात्मिकता विज्ञान के लिए चुनौती









आध्यात्मिकता और विज्ञान परस्पर विरोधी हैं अगर आध्यात्मिकता को सही से ना समझा जाए।

 दोनों दृष्टिकोण एक साथ में लेकर चलना अच्छा है मगर बड़ा मुश्किल भी।काफी कुछ विरोधाभाषी है परस्पर,  

क्योंकि आध्यात्मिकता जिन चीज़ों को स्वीकार करती है विज्ञान अक्सर उन्ही चीज़ों को अस्वीकार करता  है.

हम चाहे कितना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख लें मगर ईश्वर और अध्यात्म के स्वीकरण के बिना सब बेमानी है।

विज्ञान ने चाहे कितनी ही तरक्की की हो,कितना ही सशक्त बन गया हो लेकिन सृष्टि के रचयिता की गढ़ी चीज़ों की 

गणित कभी-कभी वह भी समझ नहीं पाता है। 

विज्ञानं और वैज्ञानिक स्वं जिससे उत्पन्न हुए हों उससे  बराबरी आख़िर कैसे हो सकती है ।

ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो ये सिद्ध करती हैं कि उस सृजनकर्ता के सामने हमारी सामर्थ्य कुछ नहीं है।

कई ऐसी चमत्कारिक घटनाएँ हैं जो विज्ञान से कहीं ज़्यादा ईश्वर पर ,आध्यात्मिकता पर विश्वास करने को विवश करती हैं। 

 कुछ उदहारण यहाँ देखिये -1भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में लगा ध्वज हवा से विपरीत दिशा में ही क्यों उड़ता है। 

2. जयपुर के गोपेश्वर नाथ जी मंदिर में भगवान कृष्ण का जो  जो विग्रह  है उस पर बाँधी गई घड़ी जो सिर्फ़ पल्स  

पर ही चलती है, कैसे चल रही है। 

३.वृन्दावन के राधा रमण जी  मंदिर के विग्रह का मुस्कुराना और हँसते हुए उनकी दंतावली का प्रत्यक्ष दिखना। 

4 . राधारमण जी मंदिर में ही 475 साल से जल रही एक अखंड अग्नि, जो की गोस्वामी गोपाल भट्ट जी ने मंत्रों  द्वारा 

प्रज़्वलित की थी।

5.दोनों किडनी 17 साल  से फेल होने के बावज़ूद वृन्दावन के एक प्रसिद्द ,राधे-कृष्ण के परम भक्त बाबा की  

अभी तक वही सुचारू दिनचर्या और चेहरे का वही तेज कैसे बना हुआ है। 

6 .गुजरात के संत प्रह्लाद जानी  जो 75 साल से बिना पानी पिए व खाना खाये ज़िंदा हैं। 


ऐसे और भी न जाने कितने उदहारण हैं जो विज्ञान के लिए अभी तक चुनौती बने हुए हैं। 

ये सब चीज़ें अध्यात्म और ईश्वर पर विश्वास बढ़ाती हैं और दूसरी तरफ़ चंद्रयान 3जैसी बड़ी  उलब्धियाँ या घटनाएँ 

विज्ञान पर विश्वास करने को मज़बूर कर देती हैं मगर एकसाथ दोनों को  लेकर चलते हुए दुविधा ये खड़ी हो 

जाती है कि किस बात पर विश्वास किया जाये।विज्ञानं की दृष्टि से चन्द्रमा उपग्रह है जबकि वेद-शास्त्र आदि देवों के 

रूप में पूजने हेतु बताते रहे हैं। वस्तुतः आध्यात्मिकता में चमत्कार होते हैं और विज्ञान में तर्क आधारित शोध और 

आविष्कार। लेकिन ये सच है कि जब विज्ञान हार मान लेता है तो ईश्वरीय चमत्कार ही कुछ कर के दिखाता है। 

तभी तो अस्पताल में अंतिम साँस से लड़ रहे मरीज़ की ज़िंदगी बचाने के लिए डॉक्टर भी  अपना भरोसा अंत में 

ईश्वर पर दिखाने लगते हैं।  विज्ञान की महत्ता अपने आप में कम नहीं है। विज्ञान भी बहुत सक्षम है मगर इसकी 

शक्ति के पीछे अध्यात्म ही छुपा हुआ है।  कुल मिलाकर तो ये ही कहूँगी कि आध्यात्मिकता के बिना विज्ञान अधूरा 

हो सकता है मगर विज्ञान के बिना आध्यात्मिकता नहीं। 

आध्यात्मिकता अपने आप में सम्पूर्ण है ,समग्र है। विज्ञान भी इसी में समाहित है. 

अध्यात्मिकता विज्ञान को हमेशा से चुनौती देती रही है। 



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