सफलता के सही मायने






'सफलता ' (success)शब्द के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं।

कोई व्यक्ति दौलत-शोहरत पा लेने  को सफलता मान लेता है,कोई आध्यात्मिक उन्नति को सफलता मानता है।

भौतिक जगत के लोगों की दृष्टि में दौलत-शोहरत पा लेने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ हो सकता है परन्तु वास्तविकता में 

आध्यात्मिक दृष्टि से मज़बूत इंसान ही वास्तविक दृष्टि में सफल है। 

इसका कारण है कि दौलत-शोहरत,आदि हर वक़्त बनी रहे ये ज़रूरी नहीं है ,सम्पन्नता और अनुकूल 

परस्थिति सदैव बनी रहें ये बिलकुल ज़रूरी नहीं है अतः विपरीत परस्थिति आने पर इंसान का बिख़र जाना निश्चित 

है।

अतः आध्यात्मिक रूप से दृढ व्यक्ति विपरीत परस्थिति में भी खुद को संभाले रख सकता है।कारण बस इतना है  

कि आध्यात्मिकता अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी ख़ुशी और मज़बूती देती है। 

अब विडम्बना ये है कि अधिकतर लोग आध्यात्मिकता के मायने ही ग़लत लगाते हैं दरअसल उन्हें स्पष्ट ही नहीं है 

कि आध्यात्मिक होना क्या है। 


अधिकतर लोगों की नज़रों में आध्यात्मिक होने का मतलब है कि वह व्यक्ति जो संसार 

छोड़कर वैरागी बन जाये ,हर वक्त मंदिर में बैठा रहे,साधु वाली वेश-भूषा पहन कर किसी आश्रम या पहाड़ी पर जा 

कर बैठ जाये। सांसारिक कर्त्तव्य छोड़ दे और फकीरों की तरह रहने लगे। नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है। 



वास्तविकता में आध्यात्मिकता सांसारिक गतिविधियों को साथ लेकर भी चल सकती है।आध्यात्मिकता सब चीज़ों 

के साथ जीवन का मूल प्राण अर्थात ईश्वर को साथ लेकर चलना है।सकारात्मकता और एक दिव्य अप्रत्यक्ष सत्ता की 

शक्ति को साथ लेकर चलना है.आध्यात्मिकता (spirituality) वस्तुतः किसी चीज़ को ज़िंदगी से कम 

करना नहीं है बल्कि जो आवश्यक है उसको add कर लेना है। 


वास्तव में भौतिकवादी लोग अपना सुकून,आराम और मानसिक शांति के लिए किसी व्यक्ति,या वस्तु विशेष पर 

निर्भर करते हैं  जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति उस सर्वशक्तिमान ईश्वर पर। 

मतलब ये है कि अगर दौलत -शोहरत होते हुए भी  मन अशांत है तो आप असफल प्राणी हैं। वास्तविक सफलता है 

शांत और स्वच्छ मन के मालिक होना अगर ये नहीं है तो आप एक गरीब इंसान हैं। पैसे से आप सुकून नहीं खरीद 

सकते लेकिन आध्यात्मिकता आपको भौतिक दृष्टि से सफ़ल और संपन्न होने में भी योगदान देती है.

अगर खूब पैसा और सुविधाएं होते हुए भी आप नींद की और BP की गोलियाँ ले रहें हैं तो आप ख़ुद को सफल 

मानते रहें भले ही मगर वास्तविकता में आप असफ़ल ही हैं। तमाम ऐसे भौतिक रूप से संपन्न लोगों के उदाहरण 

आपको मिल जायेंगे जिनके पास सब कुछ होते हुए भी मानसिक शांति के अभाव में उन्होंने अपनी जीवन लीला 

समाप्त कर ली। 


इसलिए आध्यात्मिक होना ही असली सफलता है। मनुष्य होने के नाते ईश्वरीय तत्त्व को जानकर मानवीय मूल्यों को 

अपनाकर अपने को हर परस्थिति में संयत बनाये रखने का हुनर ही असली सफलता है। मानसिक दृढ़ता ही ज़्यादा 

ज़रूरी है,अपेक्षित है।  

तभी तो भौतिक जीवन में सफल अधिकतर विदेशी लोगों ने जैसे निकोला टेस्ला,J रॉबर्ट ओपन हाइमर,जॉर्ज 

हैरिसन आदि ने भी भगवत गीता का अध्ययन किया । तो अध्यात्म को अपनाइये और सफलता के सही मायने 

जानिए।विपरीत परस्थिति में भी खुद को संयत और अनुशासित रखने की कला सीखिए। 







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