भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है स्त्री-पुरुष दोस्ती
स्त्री-पुरूष की दोस्ती एक विदेशी मानसिकता है .भारतीय संस्कृति में इसका कोई अर्थ नहीं है .यहाँ वेदों में स्त्री को
पूजनीय माना गया है,तो यहाँ हर पुरूष को स्व पत्नी के अतिरिक्त, हर स्त्री को माँ ,बहन और बेटी के रुप में देखने को
कहा है और दूसरी तरफ हर स्त्री को भी स्व पति के अतिरिक्त, अन्य सभी पुरुषों को पिता,बेटा या भाई के रुप में देखने को
कहा गया है .
फिर एक स्त्री या पुरूष की दोस्ती का अर्थ ही क्या है?अगर अपनत्व ही दिखाना है तो भाई-बहन के रूप में
दिखायें.रिश्ता ही बनाना है तो मर्यादा और पवित्रता का बनायें।
सच्चाई तो ये है कि भावों की अशुद्धता की वजह से ही ऐसा कर पाना मुश्किल होता है.अगर भाव पवित्र हैँ तो भाई
-बहन के जैसे भाव रखकर निभायें ये रिश्ता.मगर कहाँ !अगर भाई-बहन जैसा सम्बंध हुआ तो मर्यादा बीच में आ जाएगी
और मित्रवत व्यवहार हुआ तो उन्मुक्तता मिल ज़ाएगी हर प्रकार की.'दोस्ती' का ही रिश्ता रखना है तो भाई-बहन जैसी ही मर्यादा और पवित्रता होनी चाहिए उस में भी.
देखिये वस्तु स्थिति ये है कि हर व्यक्ति को अनुशासन में ,मर्यादा में रहना मुश्किल लगता है.मनुष्य की यही दुर्बलता तो
उसे तमाम जन्मों से प्रभु से विमुख किये हुये है.मनुष्य को संयम में रहना भारी पड़ता है इसलिये वो बंधनहीन,उन्मुक्त
आचरण को पसंद करता है.वरना क्या कारण है कि कोई भी पुरूष किसी महिला का भाई बनने से ज़्यादा दोस्त बनना
पसंद करता है और आजकल तो महिलायें भी पुरूष मित्र बनाने में ज़्यादा रूचि ले रही हैँ.इतना ही नहीं शादी के बाद भी
न स्त्री और न ही पुरुष को इस सम्बन्ध से कोई परहेज़ है।
दोनों ही तरफ़ से इस दोस्ती को बिना किसी विरोध के स्वीकार किया जा रहा है जो निश्चित ही भारतीय संस्कृति
में आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर बहुत बड़ा अविश्वसनीय और विचित्र परिवर्तन है।
हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति में तो महिला-पुरूष दोस्ती का कोई concept ही
नहीं है प्रारम्भ से ही .मुझे कोई उदाहरण याद नहीं आता जो प्राचीन संस्कृति में किसी स्त्री-पुरुष दोस्ती का कभी मिला हो.
ये तो कल्युगी बुद्धि की उपज है. इसलिये आज की किशोर व युवा पीढ़ी इसी में उलझी हुई है.
कोई भी स्त्री-पुरुष आखिर दोस्ती के रिश्ते में ही खुद को ज़्यादा सहज और उन्मुक्त क्यों महसूस करता हैं अन्य किसी
मर्यादित रिश्ते की अपेक्षा?
हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति में बालक और बालिका एकसाथ एक शिक्षण संँस्थान में नहीं पढ़ा करते थे। युवावस्था
और किशोरावस्था में व्यक्ति में इतनी बौद्धिक परिपक़्वता और आत्मानुशासन नहीं होता इसलिए बहुत
कम लोग ही चारित्रिक दृष्टि से दृढ़ रह पाते है।
भारतीय संस्कृति कहती है कि आप विवाह होने तक अपने होने वाले हमसफर के लिए अपनी पवित्रता बनायें रखें और
विवाह पश्चात अपने पत्नी व्रत और पतिव्रत धर्म को निभायें। स्त्री-पुरुष में दोस्ती का रिश्ता भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों के
विपरीत है।
यहाँ तो भाई -बहन जैसे रिश्ते की पवित्रता की ज़रूरत है.अन्य कोई भी भाव दूषित है .शास्त्र विरुद्ध है .स्त्री और पुरूष
को विवाह से पूर्व भी और बाद में भी सिर्फ और सिर्फ मर्यादित आचरण ही रखना चाहिए तभी वैवाहिक जीवन सफल होंगे
और चरित्रवान और स्वस्थ मानसिकता की संतान पैदा होंगी .
ये बातें दक़ियानूसी या रूढ़िवादिता से प्रेरित नहीं हैं बल्कि ये वास्तव में तर्कसंगत और औचित्यपूर्ण हैं।
जीवन में पवित्रता के लिए मानसिक पवित्रता ज़रुरी है इसलिए स्त्री-पुरुष कहीं भी साथ काम करें लेकिन मानसिक
मर्यादा का ध्यान रखते हुए ही व्यावहारिक आचरण रखिये।तभी हमारी भारतीय संस्कृति अपने मूल स्वरूप में रह पाएगी
और विशिष्ट और पूजनीय कहलाएगी।

Ek dum sahi baat kahi aapne lakin aajkal in line ko manne balo ko bahut log pagal samajh te h aur ye bhi kahte h ki pta ni khun se jamane me jee rahe h but mere hisab se aapki baat bilkul sahi h aur main is baat ko manti bhi hu
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