''मत भूलो ये भारत है''




शादी की उम्र बढ़ाना और लिवइनरेलशनशिप को छोटी उम्र में ही परमिशन देना,समलैंगकिक विवाह की अनुमति 

के समर्थन की बात करना। ये सब क्या मज़ाक है?कैसा 

खिलवाड़ है संस्कृति के साथ। आखिर हम देश की संस्कृति का कचरा करने पर क्यों लगे हुए हैं। करना क्या चाह 

रहे हैं ?क्या हम सभी को व्यभिचारी बनाना चाहते हैं?

जो संस्कृति अपनी विशिष्टता के लिए विश्व भर में प्रसिद्द है उसे क्यों नष्ट करना चाह रहे हैं। जिस देश की शिक्षा में 

संस्कार और मर्यादा की बात प्रमुख रूप से होती है और बाकी सब ज्ञान बाद में उस देश की पहचान हम क्यों 

मिटाना चाहते हैं।मानती हूँ  की महिलाओं के विकास और शिक्षा व्यवस्था पर भी  उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है  

जितनी की पुरुषों पर। दोनों को समान उन्नति के अधिकार मिलने ज़रूरी हैं।परन्तु वर्तमान में दोनों को ही उन्नति के 

नाम पर जो स्वतंत्रता दी जा रही है वो उचित नहीं है।महिलाओं ने तो स्वतंत्रता के नाम पर हद  ही कर दी है न तो 

पहनावे में शालीनता बची है और न ही आचरण में.

जिस देश में आत्म सम्मान की और चरित्र की रक्षा हेतु तमाम नारियाँ जौहर कर चुकी हों।जहाँ की नारियाँ अपने  

पातिव्रत धर्म से यमराज को भी झुकाने की क्षमता रखती हों उस देश का ऐसा पतन ! 


मत भूलिए ये भारत है। विश्व गुरु है।विश्व गुरु सिर्फ इसलिए है क्योंकि यहाँ की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ रही है विश्वबंधुत्व ,

,सदाचार,मर्यादा यहाँ की संस्कृति की ही विशेषता रही हैं। यहाँ से विदेश के लोग बहुत कुछ अच्छा सीख रहें हैं। 

सभ्यता ,संस्कार आदि और हम खुद अपनी संस्कृति की महत्ता नहीं समझ रहे और भ्रष्ट हो रहे हैं। तलाक ,लिवइन 

,एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर ,गर्ल फ्रेंड -बॉय फ्रेंड आदि ये सब प्रदुषण बाह्य संस्कृति की देन हैं।हमारी भारतीय सनातन 

संस्कृति में इन चीज़ों का कोई अस्तित्व नहीं है।

 बड़े -बड़े संत कहते हैं कि भारत में जन्म लेना बहुत सौभाग्य की 

बात है और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को अपनाते हुए जीना और भी बड़ी प्रभु कृपा है।तो क्यों व्यर्थ करते हो 

ये सब उपलब्धि। क्यों गवाते हो ये सुन्दर जन्म जो भारत में और भारतीय संस्कृति की खुशबू के साथ मिला है। गर्व 

करो इस संस्कृति पर ,भारतीयता पर।अपनी चीज़ों की वेल्यू करना सीखें। बहुत बड़ा सौभाग्य है आपका की आप 

इतनी पवित्र धरती पर जन्मे हैं। इसकी पवित्रता न खोने दें। इसकी संस्कृति को दूषित होने से बचाएं। पाश्चात्य 

संस्कृति के पीछे पागल होना आपकी ज्ञान शून्यता और विवेकहीनता का परिचायक है।छोड़ दो जो भी ग़लत चीज़ 

परोसी जा रही है। मत अपनाओ ,मत नक़ल करो गन्दी चीज़ों की।.मत अमर्यादित बनो। मत भूलो ये वो भारत है 

जहाँ स्त्रियों न शरीर से ज़्यादा , सम्मान,इज़्ज़त की परवाह  की है।चरित्र और मर्यादा के लिए सब  कुछ  त्यागा है। 

तो इंस्टाग्राम पर अश्लील नृत्यों की रील डालकर,सिगरेट का धुआँ उड़ाकर,पुरुष दोस्त बनाकर उनके साथ इधर 

-उधर पार्क आदि में अनावश्यक भ्रमण ,बेहूदा हंसी-मज़ाक,अश्लील संवाद कर क्यों अपने चरित्र को अपवित्र 

करती हो। और क्यों पुरुष पसंद करते हैं ऐसी अमर्यादित युवतियों को।क्या दोनों में ही संस्कार और मर्यादा नहीं 

बची है. सही -ग़लत का ज्ञान नहीं बचा है। शुद्धता नहीं बची है।संभाल जाइये अभी भी वक्त है,वर्ना मूल संस्कृति का 

अता पता नहीं रहेगा। देखिये स्वतंत्रता और फूहड़ता में एक बड़ा अंतर होता है। स्वतंत्रता का अर्थ है सही दिशा में 

विकास के अवसर प्रदान करना ,अनुचित परम्पराओं को तोडना जो हर दृष्टि से विकास में बाधक हों। मगर जब 

स्वतंत्रता के नाम पर मनमौजी आचरण हो ,नैतिक मर्यादा का उल्लंघन हो तो वो फूहड़ता हो जाती है। बस इसे ही 

रोकना है अपनी प्रभावशाली भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु।।


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