संदेश

व्यथित  होती हूँ जब रिश्तों  की मर्यादा टूटती है मायूस  होती हूँ जब संबंधों से  आत्मीयता छूटती  है रुलाता  है ये आयातित परिवर्तन जो संस्कृति को छल रहा है कुछ ऐसा बदलाव जो अस्वीकार्य है मन को क्यों इस देश में पल रहा है विरोध के स्वर जब भी उठाने की कोशिश की वो तमाम ऑखें मुझे नापाक घूरती हैं भीख मांग रही नैतिकता स्व अस्तित्व की दर व दर अधर्म की हंसी बार-बार छूटती है ये कैसा कहर ,कैसा है मंजर निर्लज्जता यहाँ सरे आम  घूमती है copy right anshu@1994  
शब्द राग से निकले गीत हो गए कुछ सुर मिले आवाज से मीत हो गए खुशबू बिखेर कर चली वो ग़जल  इस तरहा गायक भी उसके आशिक मन प्रीत हो गए वीणा नुपुर पद ताल से संगीत यूं रिसने लगा मौन भी स्वर लहरों में कहीं खो गए अनकहे जुबां उस रात तो कई बात जैसे कह गई 'तानसेन'के गान से रोशन जब दीप हो गए बैठ कर सीप में मोती भी  अपने  जीवन पर रोने लगा मुझ से उन्मुक्त आज तो कविता छंद हो गए ।। 

'मयके की गलियाँ '

वो  गुजरा ज़माना वो मयके की गलियां माँ की जरा-जरा सी बात पर मेरा रूठ जाना अब बहुत याद आता है ।  बीते हरेक सायते की मेरे वर्तमान में दख़ल ये तो नहीं कि मुझे अजीयत  में डालती है , मगर अपनी नादानियों पर अब मलाल आता है । मेरी नानी जो लगती थी हुस्न परी सी कभी, उसके गालों की झुर्री और झुकी कमर देख जवानी का यूँही ख़याल आता है । कितनी ममता लुटाई थी उसने बचपन पे मेरे क़र्ज  कैसे चुकाऊँ जहन में बस ये  ही सवाल आता है.