'मयके की गलियाँ '

वो  गुजरा ज़माना वो मयके की गलियां

माँ की जरा-जरा सी बात पर मेरा रूठ जाना

अब बहुत याद आता है ।

 बीते हरेक सायते की मेरे वर्तमान में दख़ल

ये तो नहीं कि मुझे अजीयत  में डालती है ,

मगर अपनी नादानियों पर अब मलाल आता है ।

मेरी नानी जो लगती थी हुस्न परी सी कभी,

उसके गालों की झुर्री और झुकी कमर देख

जवानी का यूँही ख़याल आता है ।

कितनी ममता लुटाई थी उसने बचपन पे मेरे

क़र्ज  कैसे चुकाऊँ जहन में बस ये  ही सवाल आता है.



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