शब्द राग से निकले गीत हो गए
कुछ सुर मिले आवाज से मीत हो गए
खुशबू बिखेर कर चली वो ग़जल  इस तरहा
गायक भी उसके आशिक मन प्रीत हो गए
वीणा नुपुर पद ताल से संगीत यूं रिसने लगा
मौन भी स्वर लहरों में कहीं खो गए
अनकहे जुबां उस रात तो
कई बात जैसे कह गई
'तानसेन'के गान से रोशन जब दीप हो गए
बैठ कर सीप में मोती भी  अपने  जीवन पर रोने लगा
मुझ से उन्मुक्त आज तो कविता छंद हो गए ।। 

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