व्यथित  होती हूँ जब रिश्तों  की मर्यादा टूटती है
मायूस  होती हूँ जब संबंधों से  आत्मीयता छूटती  है
रुलाता  है ये आयातित परिवर्तन जो संस्कृति को छल रहा है
कुछ ऐसा बदलाव जो अस्वीकार्य है मन को
क्यों इस देश में पल रहा है
विरोध के स्वर जब भी उठाने की कोशिश की
वो तमाम ऑखें मुझे नापाक घूरती हैं
भीख मांग रही नैतिकता स्व अस्तित्व की दर व दर
अधर्म की हंसी बार-बार छूटती है
ये कैसा कहर ,कैसा है मंजर
निर्लज्जता यहाँ सरे आम  घूमती है
copy right anshu@1994  

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