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'सास -बहु 'मंदिर या सहस्र-बाहु मंदिर

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ग्वालियर का 'सास -बहु ' मंदिर  'सास -बहु 'मंदिर के नाम से अक्सर लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि ये मंदिर आपस में बहुत प्यार से रहने वाली किसी सास व बहु के आपसी प्यार और समर्पण को  दिखाने के लिए निर्मित किया गया होगा  लेकिन ऐसा नहीं है। ये मंदिर सास और बहु से सम्बंधित तो है परन्तु इसकी कहानी कुछ और है।राजस्थान के उदयपुर में ये मंदिर स्थित हैं। 10वीं सदी में  राजा महिपाल द्वारा उदयपुर में निर्मित करवाया  गया ये  मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर उदयपुर से 23 किलो मीटर दूर नागदा ग्राम में राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर स्थित है। यह उदयपुर का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। मंदिर दो संरचनाओं का बना हुआ है इनमे से एक का निर्माण सास व दूसरे का बहु द्वारा करवाया गया है। मंदिर में प्रवेश द्वार ,नक्काशीदार छत और बीच में कई खांचों वाली मेहराब है। मंदिर में एक वेदी ,एक पोर्च एक प्रार्थना सभा है। उदयपुर से मात्र 28 किलोमीटर पर एकलिंग जी भगवान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। इस मंदिर से थोड़ा पहले ही कच्चे रास्ते पर वास्तुकला का बे...

सास से साँस तक

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   एक साँस और दूसरा सास फ़र्क जरा सा लिखने में है लेकिन बड़ा  ये अंतर रखते हैं। एक जीवन के संचालन की ,दूज़ा प्राण हरण की ताकत रखते  हैं. निज संतान गुणों  का वर्णन  जहाँ सास मुक़्त कंठ से करती  हैं वहीँ  बहु की चुगली कर अक्सर , गुण ताक  में रखती है। बेटा मेरा समझदार है बहु  थोड़ी  नासमझ  सी  है जो भी हासिल है इस घर में ,मेरे पुत्र की उपलब्धि है। उसकी बहु  भर लाई गहने  मेरी तो रीती  सी है। पाली थी जो उम्मीदें रह गईं मन की  मन में क्या कहें जो हम पर बीती है। पहले तो शादी के लिए बेटे की, लड़की के टोटे पड़ते हैं बाद ब्याह के दे -दे ताने,  ऊँची -ऊँची फ़ेंका करते हैं। निज़ पुत्री ससुराल में जब ,दहेज़ यातना सहती है। तब इस माँ को अपनी  बहु की, पीर -वेदना दिखती है। बन बैठे असली माँ जो मन से, तब बहु  ना नज़र पराई आऐगी  अपनी माँ जैसा  अहसास ही बहु सासू -माँ  में पाऐगी।  गुण  देखो ,अवगुण न खोजो ...

प्यारे बुद्धा

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ज्ञान योग में डूबे बुद्धा ,महल -मोह से रिक्त ये बुद्धा विरक्ति की राह पे चलते ,जाने क्यों अच्छे लगते हैं।                                                            रास-रंग से विलग-थलग से ,ज्ञान-ललक में रमे -रचे से  सन्यासी के भाव-वेश में , जाने क्यों अच्छे लगते हैं।  मौन भाव से बैठे तप में ,मुक्त हुए से सब बंधन से  कुछ कहते से क्यों लगते हैं।  धीर -गंभीर ,मन मोहक से ,उजले -तन और उजले मन के  एक पवित्र ,दिव्य -प्रकाश की, ज्योति में निखरे जब  भी  मिलते हैं  परम -अलौकिक ,तत्व ज्ञान में लिप्त, मग्न से,  उच्च आकर्षण से ,वशीभूत करते लगते हैं।  -अंशु चौहान