'सास -बहु 'मंदिर या सहस्र-बाहु मंदिर
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| ग्वालियर का 'सास -बहु ' मंदिर |
'सास -बहु 'मंदिर के नाम से अक्सर लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि ये मंदिर आपस में बहुत प्यार से रहने वाली
किसी सास व बहु के आपसी प्यार और समर्पण को दिखाने के लिए निर्मित किया गया होगा लेकिन ऐसा नहीं है।
ये मंदिर सास और बहु से सम्बंधित तो है परन्तु इसकी कहानी कुछ और है।राजस्थान के उदयपुर में ये मंदिर स्थित हैं।
10वीं सदी में राजा महिपाल द्वारा उदयपुर में निर्मित करवाया गया ये मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।
यह मंदिर उदयपुर से 23 किलो मीटर दूर नागदा ग्राम में राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर स्थित है।
यह उदयपुर का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।
मंदिर दो संरचनाओं का बना हुआ है इनमे से एक का निर्माण सास व दूसरे का बहु द्वारा करवाया गया है।
मंदिर में प्रवेश द्वार ,नक्काशीदार छत और बीच में कई खांचों वाली मेहराब है।
मंदिर में एक वेदी ,एक पोर्च एक प्रार्थना सभा है।
उदयपुर से मात्र 28 किलोमीटर पर एकलिंग जी भगवान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
इस मंदिर से थोड़ा पहले ही कच्चे रास्ते पर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना ये'सास-बहु' मंदिर स्थित है।
11वीं सदी में बने इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु मंदिर और बहु ने
शिव मंदिर बनवाया था। इसी कारण से ही इन मंदिरों को सास -बहु के मंदिर के रूप में जाना जाने लगा।
के कारण इनकी तुलना देलवाड़ा मंदिर और रणकपुर के जैन मंदिरों से की जाती है।
ये मंदिर ग्वालियर में भी ऐसे ही सुंदरता से बनाए गए हैं।इन मंदिरों का वास्तविक नाम तो सहस्रबाहु मंदिर ही है लेकिन सास-बहु के द्वारा निर्मित करवाए जाने से और शायद बोलने में सहजता की दृष्टि से इनका नाम सास-बहु मंदिर हो गया है।
इस मंदिर से थोड़ा पहले ही कच्चे रास्ते पर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना ये'सास-बहु' मंदिर स्थित है।
11वीं सदी में बने इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु मंदिर और बहु ने
शिव मंदिर बनवाया था। इसी कारण से ही इन मंदिरों को सास -बहु के मंदिर के रूप में जाना जाने लगा।
राजमाता विष्णु जी की और बहु शिव जी की भक्त थीं।किंवदंती के अनुसार यहाँ पहले भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था जिस वजह से इनका नाम अपभ्रंश होकर सास -बहु मंदिर हो गया।
मंदिर की दीवारों पर रामायण की घटनाओं का सुन्दर चित्रण किया गया है। सुन्दर कारीगरी ,अद्भुत नक़्क़ाशीके कारण इनकी तुलना देलवाड़ा मंदिर और रणकपुर के जैन मंदिरों से की जाती है।
ये मंदिर ग्वालियर में भी ऐसे ही सुंदरता से बनाए गए हैं।इन मंदिरों का वास्तविक नाम तो सहस्रबाहु मंदिर ही है लेकिन सास-बहु के द्वारा निर्मित करवाए जाने से और शायद बोलने में सहजता की दृष्टि से इनका नाम सास-बहु मंदिर हो गया है।

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