सास से साँस तक


  

एक साँस और दूसरा सास फ़र्क जरा सा लिखने में है

लेकिन बड़ा  ये अंतर रखते हैं।

एक जीवन के संचालन की ,दूज़ा प्राण हरण की ताकत रखते  हैं.

निज संतान गुणों  का वर्णन  जहाँ सास मुक़्त कंठ से करती  हैं

वहीँ  बहु की चुगली कर अक्सर , गुण ताक  में रखती है।

बेटा मेरा समझदार है बहु  थोड़ी  नासमझ  सी  है

जो भी हासिल है इस घर में ,मेरे पुत्र की उपलब्धि है।

उसकी बहु  भर लाई गहने  मेरी तो रीती  सी है।

पाली थी जो उम्मीदें रह गईं मन की  मन में

क्या कहें जो हम पर बीती है।

पहले तो शादी के लिए बेटे की, लड़की के टोटे पड़ते हैं

बाद ब्याह के दे -दे ताने,  ऊँची -ऊँची फ़ेंका करते हैं।

निज़ पुत्री ससुराल में जब ,दहेज़ यातना सहती है।

तब इस माँ को अपनी  बहु की, पीर -वेदना दिखती है।

बन बैठे असली माँ जो मन से, तब बहु  ना नज़र पराई आऐगी 

अपनी माँ जैसा  अहसास ही बहु सासू -माँ  में पाऐगी। 

गुण  देखो ,अवगुण न खोजो ,नहीं सर्वगुणी  सब जग में 

दोगे अपनापन  तो , हो जाऐगी अपनी पल भर में।

ऐसी भी  होती हैं सासें ,जिनके मन मंदिर से होते हैं

चरण ऐसी ही  सासू माँ के, हम विनम्र हो धोते हैं।







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