प्यारे बुद्धा
ज्ञान योग में डूबे बुद्धा ,महल -मोह से रिक्त ये बुद्धा
विरक्ति की राह पे चलते ,जाने क्यों अच्छे लगते हैं।
रास-रंग से विलग-थलग से ,ज्ञान-ललक में रमे -रचे से
सन्यासी के भाव-वेश में , जाने क्यों अच्छे लगते हैं।
मौन भाव से बैठे तप में ,मुक्त हुए से सब बंधन से
कुछ कहते से क्यों लगते हैं।
धीर -गंभीर ,मन मोहक से ,उजले -तन और उजले मन के
एक पवित्र ,दिव्य -प्रकाश की, ज्योति में निखरे जब भी मिलते हैं
परम -अलौकिक ,तत्व ज्ञान में लिप्त, मग्न से,
उच्च आकर्षण से ,वशीभूत करते लगते हैं।
-अंशु चौहान

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