संदेश

काश

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कृष्ण युग की मैं भी कोई ,काश गोपिका होती धो -धो चरण अपने प्रभु के ,भर -भर पानी पीती सुन्दर उपवन ,मेरे मन का कोना -कोना होता मोह -माया, न जग का कोई रोना- धोना होता छीन मुरलिया कभी मै उनकी ,स्व अधरों से बजाती मोहित हो उनकी छवि से मधुर - मधुर धुन गाती होती इच्छा पल में पूरी ,ना कुछ कहना ,सुनना होता मेरे मन से ,उनका ऐसा गहरा रिश्ता होता उन  आँखों में ही जगती, उन आँखों में सो जाती भूल के सारी दुनिया -दारी बस उनकी हो जाती ।।

सहमा बचपन

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कुछ नापाक निगाहें अब बचपन पर 'आरी' हैं हिफाज़त मासूम दिलों की सबकी ज़िम्मेदारी है  दादी -नानी की परियों की कहानी अब ना इन्हें सुनानी हैं  झाँसी -रानी की वीर- गाथा अब इनको गुनगुनानी  है  खेल -खिलौने  नहीं अब कुंफू -कराटे की बारी है मासूमियत ख़तरे में है सतर्कता निभानी है निर्मम,निरंकुश ,बेख़ौफ़ दरिंदों से नेकी बचानी है ख़ौफ़  नहीं बस  अब हिम्मत दिखानी है। लुट रही हैं ज़िंदगियाँ निर्दोष भोली-भाली होठों पे बचपन के मुस्कान वापस लानी है। -अंशु चौहान

हिंदी के प्रति मेरा लगाव

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हिंदी भाषा के प्रति मै विशेष लगाव रखती हूँ-  पहला कारण तो ये कि देव भूमि उत्तराखंड से सम्बंध रखती हूँ । यहाँ सभी की हिंदी भाषा कुछ ज़्यादा ही अच्छी होती है इसलिए बचपन में घर के हर सदस्य का शुद्ध हिंदी में  वार्तालाप करना इसके लिए विशेष उत्तरदायी रहा है.  दूसरा कारण रहा हिंदी साहित्य में ग्रेजुएट होना। पोस्ट  ग्रेजुएशन में हालाँकि राजनीति विज्ञानं ने इसकी जगह ले ली थी फिर भी इस समय अंतराल में इस विषय ने मुझ पर  गहरा प्रभाव डाला। मेरे लेखन की शुरुआत इसी दौरान हुई।  हिंदी साहित्य के हर कवि और कवयित्री से  मै  बहुत  प्रभावित रही हूँ। उसी साहित्य का प्रभाव मेरी  भाषा में दिखाई देता है। मै इस भाषा की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हूँ  कि  मै चाह कर भी सरल शब्द नहीं ढूँढ पाती और अनायास ही कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग अपनी भाषा में कर  बैठती हूँ।   मेरी क्लिष्ट भाषा पर अक्सर लोग स्तब्ध रह जाते हैं या प्रश्न खड़े कर देते हैं।कुछ मुस्कुराते हैं तो कुछ समझ नआने  पर परेशान हो जाते हैं। लेकिन मै अपने...