सहमा बचपन





कुछ नापाक निगाहें अब बचपन पर 'आरी' हैं

हिफाज़त मासूम दिलों की सबकी ज़िम्मेदारी है 

दादी -नानी की परियों की कहानी अब ना इन्हें सुनानी हैं 

झाँसी -रानी की वीर- गाथा अब इनको गुनगुनानी  है 

खेल -खिलौने  नहीं अब कुंफू -कराटे की बारी है

मासूमियत ख़तरे में है सतर्कता निभानी है

निर्मम,निरंकुश ,बेख़ौफ़ दरिंदों से नेकी बचानी है

ख़ौफ़  नहीं बस  अब हिम्मत दिखानी है।

लुट रही हैं ज़िंदगियाँ निर्दोष भोली-भाली

होठों पे बचपन के मुस्कान वापस लानी है।
-अंशु चौहान

















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