काश








कृष्ण युग की मैं भी कोई ,काश गोपिका होती

धो -धो चरण अपने प्रभु के ,भर -भर पानी पीती

सुन्दर उपवन ,मेरे मन का कोना -कोना होता

मोह -माया, न जग का कोई रोना- धोना होता

छीन मुरलिया कभी मै उनकी ,स्व अधरों से बजाती

मोहित हो उनकी छवि से मधुर - मधुर धुन गाती

होती इच्छा पल में पूरी ,ना कुछ कहना ,सुनना होता

मेरे मन से ,उनका ऐसा गहरा रिश्ता होता

उन  आँखों में ही जगती, उन आँखों में सो जाती

भूल के सारी दुनिया -दारी बस उनकी हो जाती ।।



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