हिंदी के प्रति मेरा लगाव



हिंदी भाषा के प्रति मै विशेष लगाव रखती हूँ-  पहला कारण तो ये कि देव भूमि उत्तराखंड से सम्बंध रखती हूँ ।

यहाँ सभी की हिंदी भाषा कुछ ज़्यादा ही अच्छी होती है इसलिए बचपन में घर के हर सदस्य का शुद्ध हिंदी में 

वार्तालाप करना इसके लिए विशेष उत्तरदायी रहा है.  दूसरा कारण रहा हिंदी साहित्य में ग्रेजुएट होना। पोस्ट 

ग्रेजुएशन में हालाँकि राजनीति विज्ञानं ने इसकी जगह ले ली थी फिर भी इस समय अंतराल में इस विषय ने मुझ पर 

गहरा प्रभाव डाला। मेरे लेखन की शुरुआत इसी दौरान हुई।  हिंदी साहित्य के हर कवि और कवयित्री से  मै  बहुत 

प्रभावित रही हूँ। उसी साहित्य का प्रभाव मेरी  भाषा में दिखाई देता है। मै इस भाषा की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हूँ 

कि  मै चाह कर भी सरल शब्द नहीं ढूँढ पाती और अनायास ही कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग अपनी भाषा में कर 

बैठती हूँ।

 
मेरी क्लिष्ट भाषा पर अक्सर लोग स्तब्ध रह जाते हैं या प्रश्न खड़े कर देते हैं।कुछ मुस्कुराते हैं तो कुछ समझ नआने 

पर परेशान हो जाते हैं। लेकिन मै अपने देश में अपनी भाषा का सही ,समृद्ध रूप उपयोग में ला रही हूँ इससे प्रसन्न 

होने की जगह लोग खुंदस में आ जाते हैं। ये सोचकर बड़ा दुःख होता है। अपनी मातृ  भाषा के ज्ञान और 

उपयोग पर सबको आपत्ति क्यों है। इसका ज्ञान बढ़ाने की जगह हम इसकी उपेक्षा का मानस क्यों बना लेते हैं।

जब हम अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा को समझने के लिए उसके गहन अध्ययन में जुट जाते हैं और इसके लिए हम 

अंग्रेजी या उस भाषा का शब्द-कोष खरीदने पर, अख़बार लगाने पर ,संबन्धित विषय की अध्ययन कक्षाओं में जाने 

के लिए सजग हो जाते हैं तो हिंदी के लिए  ऐसा  क्यों नहीं करते?अपने ही घर में हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों 

होता है ?इस भाषा को अपनाने पर हम स्वं को छोटा क्यों महसूस करने लगते हैं ?जबकि भावों की अभिव्यक्ति के 

लिए इससे समृद्ध और सुन्दर भाषा कोई नहीं है। सोचिए हिंदी के प्रति यही रवैया पहले होता तो इतना सुन्दर 

साहित्य जो महादेवी वर्मा ,हरिवंश रॉय बच्चन,सूर्यकान्त त्रिपाठी,जय शंकर प्रसाद,हजारीप्रसाद द्धिवेदी आदि द्वारा 

लिखा गया कहाँ पढ़ने को मिलता ?

तुलसीदास आदि इतने पवित्र काव्य की रचना कैसे कर पाते।


जो पवित्रता ,सहजता और बोधगम्यता इस भाषा में है अन्य में नहीं है। अगर पहले से ही इस भाषा की उन्नति के 

लिए हम प्रयासरत रहते तो आज हिंदी एक प्रतिष्ठित भाषा के रूप में भारत में ही नहीं वरन विदेशों में भी स्थापित 

होती।


(शिक्षक दिवस के अवसर पर)


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