संदेश

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मै भी खड़ी हूँ झूठ के प्रतिरोध में लेकिन चयन शब्दों का मर्यादा में मै  बेहतर समझती हूँ |  छोड़ दूँ बंदगी ,भूलकर शिष्टता त्यागकर  अपनी आन और शान -बान को  इस क़दर बेअदब होना मै बद्द्तर समझती हूँ  | चयन शब्दों का मर्यादा में मै बेहतर समझती हूँ |   भरी आक्रोश में हूँ ख़ूब ,मन दहकती ज्वाला है ,तहज़ीबों की सीमा ने इस दिल को सँभाला है |  छोड़कर संस्कृति और संस्कार को ,त्यागना इस तरहा सद्व्यवहार को , सभ्यता और दिलों पर मै ये नश्तर समझती हूँ |  चयन शब्दों का मर्यादा में मै बेहतर समझती हूँ | 

'अम्मा का दुलार '

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मिट्टी के उस आँगन में चूल्हे के पास बैठी हुई मेरी अम्मा के हाथों  में थमे थे चकला - बेलन, जिनसे  हर बार गोल रोटी बनकर मेरी थाली में आती थी। मुख पर लगी जूठन को जब अम्मा अपनी साड़ी के पल्लू से हटाती थी , उसके मैले -कुचैले पल्लू में  भी ममता की ख़ुशबू नज़र आती थी। अपनी गोद में बिठाकर उसका निबाले खिलाना वो गोद अम्मा की जन्नत नज़र आती थी। साग की कटोरी में मक्ख़न ढेर सारा खाना जब भी खिलाती थी वो यशोदा  बन जाती थी वो सबसे अलग थी ,अनूठी थी ,न्यारी थी उसकी डाट भी मधुर गीत सी लुभाती थी। ये उसकी ममता ,उसका दुलार ही  तो था  जो होकर सयानी भी मै बच्ची ही कहलाती थी। -अंशु  चौहान

पत्रकारिता 'लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ

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'पत्रकारिता 'लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है जो  कार्यपलिका ,व्यवस्थापिका और  न्यायपालिका  के  बाद  लोकतंत्र  में  महत्वपूर्ण  स्थान रखती  है .लोकतंत्र  को  सुदृढ  और  सशक्त  बनाये  रखने  में  इसकी  महत्वपूर्ण  भूमिका  होती  है . लेकिन  इसके  लिए पत्रकारिता  का  निष्पक्ष ,निडर व  मजबूत  होना  बहुत  ज़रूरी  है तभी  ये अपना  दायित्व  निष्ठा  के  साथ  निभा  पायेगी.   आज  के  परिप्रेक्ष्य में  यदि  देखें  तो एक  स्वतंत्र ,निष्पक्ष व  साहसी पत्रकारिता का  अस्तित्व  खतरे  में  है .पत्रकारों की जगह -जगह हो रही  नृशंस हत्या ,उन पर हो  रहे  आक्रमण व  अपमान जनक व्यवहार से केवल  पत्रकारिता ही  नही संपूर्ण  लोकतंत्र व  समग्र देश  ही खतरे में  है . जब  भी  निष्पक्ष  व  साहसी पत्रकार...