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'फिर किसी बात पे नाराज़ है वो'(गज़ल)

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  फिर किसी बात पे नाराज़ है वो  मेरी खामोश निगाहों की आवाज़ है वो  फिर किसी बात पे नाराज़ है वो  1.ना ही मुझसे संभलता है उसकी बेरूखी का गम, ना ही मेरे  बिना भरता वो कदम ,   कई दिन से ताबियत नासाज़ है वो  फिर किसी बात पे नाराज है वो . 2.मुझपे इल्ज़ाम लगाकर,खुद को भगवान कहा करता है , मेरी मासूमियत से अंजान रहा करता है मुझको ठहरा गया गुनेहगार सा वो . - -अन्शु चौहान    

यूँही नहीं होती हैं रुसवाइयाँ ..(गज़ल )

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यूँही नहीं होती हैं रुसवाइयाँ दिल की,किसी   शख्स पर तो इल्ज़ाम होता होगा 1.भीड़ में भी तन्हा सा फिरता है आजकल वो , वक्त और हालात पर रोता है आजकल जो लड़खड़ाता हुआ उसका हर अल्फाज़ तो होगा . यूँही  नहीं होती हैं....... 2.रूह में सिमटी हुई यादों का बवंडर है ,प्यासी है  आरजू और दूर समन्दर है,बेबस सी हकीकत पर  सहमा सा हर जज़्बात तो होगा  यूँही नहीं होती है ... ..       -Anshu Chauhan                      

"उसे भी हक है "(कविता)

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 उसे भी हक है खुलकर खिलखिलाने का   के उसकी सांसे भी ग़मों से बोझिल होती हैं उसे भी हक़ है बिन बताए बाहर जाने का  के उसकी सीमायें भी विवशता से बंधी होती हैं उसे भी हक है सबसे पहले खाने का  के उसके साथ भी दवाईयों की पर्चियाँ जुड़ी होती है उसे भी हक है बारिश में नहाने का  के उसकी तमन्नाएं भी सावन से जुड़ी होती हैं  उसे भी हक है ज़ोर से बातें करने का के उसकी खामोशियां भी शोर से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है आकाश में उड़ने का  के उसकी हिम्मतें भी परों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है नदियों सा गुंगुनाने का  के उसकी मन तरंगें भी लहरों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है बहुरूपी पोशाकों का के उसमें भी अल्लहड़ सी छवि छुपी होती है उसे भी हक है पुरूष से भिड़ जाने का  के उसमें भी 'दुर्गा' सी  शक्ति छुपी होती है उसे भी हक है विरोध हित डट जाने का  के उसकी स्वतन्त्रता भी अधिकारों से जुड़ी  होती है.    -अंशु चौहान                                     ...