'फिर किसी बात पे नाराज़ है वो'(गज़ल)


 



फिर किसी बात पे नाराज़ है वो 

मेरी खामोश निगाहों की आवाज़ है वो 

फिर किसी बात पे नाराज़ है वो 

1.ना ही मुझसे संभलता है उसकी बेरूखी का गम,

ना ही मेरे  बिना भरता वो कदम ,  

कई दिन से ताबियत नासाज़ है वो 

फिर किसी बात पे नाराज है वो .

2.मुझपे इल्ज़ाम लगाकर,खुद को भगवान कहा करता है ,

मेरी मासूमियत से अंजान रहा करता है

मुझको ठहरा गया गुनेहगार सा वो .

-

-अन्शु चौहान 


  

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