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हर वक्त की खामोशी भी अच्छी नहीं होती

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घरेलु हिंसा या डोमेस्टिक वायलेंस एक ऐसी हिंसा है जो सार्वजनिक रूप से तो उजागर नहीं हो पाती है लेकिन भीतर ही भीतर इतनी मज़बूती से जम जाती है कि  इसके शिकार व्यक्ति की ज़िंदगी को  ये नर्क बना देती है। घरेलु हिंसा का सबसे दुःखद पहलू ये है कि इसमें व्यक्ति अपने ही घर में असुरक्षित और भयभीत सा महसूस करता है। वह अपने ही किसी रिश्तेदार के अत्याचार का शिकार होता है। वह चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर पाता है। अपने परिवार की प्रतिष्ठा के लिए वह चुपचाप अपने को कुर्बान करने को तत्तपर रहता है। सब कुछ सुनकर ,सहकर देखकर भी अनजाना बना रहता है लेकिन ऐसा करना वास्तविकता में बहुत ग़लत है।  किसी के साथ अन्याय को करना व सहन करना  दोनों  ही  ग़लत बताये गए हैं । अगर किसी के साथ घर में कोई भी ऐसा व्यवहार हो रहा है जो नैतिक दृष्टि से ग़लत है तो उसे मत सहिये। स्वं विरोध कीजिये और संभव न हो तो कानून की मदद लीजिये। इस दुनिया में भगवान ने सभी को स्वतंत्र व सम्मान से जीने का हक़ दिया है। अगर कोई भी भावनात्मक तरीके से या अन्य किसी भी तरीके से तुम पर हावी होने की कोशिश कर रहा है तो उसका सामना कीजि...

बंधुत्व भाव हो तो युद्ध क्यों

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"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"    हम सब अगर विश्व बंधुत्व का भाव मन मे लेकर चलें और क्रोध,द्वेष,लोभ,वासना,नफरत इन 5 भावों का नाश कर लें तो पूरी दुनिया में किसी को सिक्योरिटी फोर्स की,किसी अस्त्र-शस्त्र की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. कितनी विचित्र सी बात है कि हम हर देश की  सीमा पर जो ये सीमा सुरक्षा बलों को देखते हैं इसके पीछे कहीं ना कहीं मूल कारण सम्पूर्ण मानव सभ्यता में प्रेम का अभाव और आपसी द्वेष-भाव ही है.अगर सभी में विश्व-बंधुत्व की भावना हो तो क्यों इतना भयग्रस्त रहें सब.क्यों परमाणु बम ,न्युक्लियर बम ,मिसाइल आदि विध्वंशात्मक चीजों के निर्माण पर,इनके संग्रह पर जोर दिया जाएगा. ज़रा ध्यान से सोचिये कि क्या  आज  पूरी दुनिया विध्वंश,हिंसा और द्वेष को बढ़ाने में नहीं लगी हुई है.हम सभी क्या  कभी ये सोचते हैं कि हम सभी पृथ्वी वासी उस परम सत्ता( प्रभु) के प्रति समान रुप से उत्तरदायी हैं.हमने भले ही अपनी बुद्धिनुसार अपनी अलग-अलग    सत्ताओं का निर्माण कर लिया हो पर हमारा (सम्पूर्ण सृष्टि) का राजा त...

सोचना तो पड़ेगा

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  बड़ी पीड़ादायक बात है कि समाज में कुछ व्यक्ति मर्यादा और अनुशासन को बोझ मान कर मनमानी स्वतन्त्रता और  उद्दन्डता के पक्षधर होते  जा रहे  है.ऐसा कोई भी आचरण ज़िसमे आत्मानुशासित होना पड़े उनको कष्टप्रद लग  रहा है.मानसिक पवित्रता गायब सी होती जा रही है.ये लोग बस भोग-विलास के लिए प्रयासरत है.नैतिकता की बात  इनके लिए मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.संस्कारो की बात पिछड़ापन हैं,अवैज्ञानिक हैं.भलाई की बात करने वाला  इनका सबसे बडा शत्रु है .आध्यात्मिक बातें करने वाला इनकी दृष्टि में  सबसे बड़ा मनोरोगी है . अब ऐसे में सब कुछ उसी के ( प्रभु के) हाथ में है,उस परम सत्ता के. वरना सच कहूँ  तो इस समय समाज में कुछ  चीज़ें, बड़ी ही घृणास्पद व असहनीय घट रही हैं।  लिवइन रिलेशनशिप,रेप,हत्या इनसे सम्बंधित समाचार ही प्रमुखता से सब जगह पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं. मर्यादा  में  रहना  ऐसे लोगों  के लिए इतना मुश्किल हो रहा है कि ये लोग इस पीड़ा से बचने हेतु विभिन्न प्रकार की   सुविधा और स्वतन्त्रता हेतु अपने दिमाग का दुरूपयोग कर रहे हैं. ...