बंधुत्व भाव हो तो युद्ध क्यों


"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"


  
हम सब अगर विश्व बंधुत्व का भाव मन मे लेकर चलें और क्रोध,द्वेष,लोभ,वासना,नफरत इन 5 भावों का नाश कर लें तो पूरी दुनिया में किसी को सिक्योरिटी फोर्स की,किसी अस्त्र-शस्त्र की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

कितनी विचित्र सी बात है कि हम हर देश की  सीमा पर जो ये सीमा सुरक्षा बलों को देखते हैं इसके पीछे कहीं ना कहीं मूल कारण सम्पूर्ण मानव सभ्यता में प्रेम का अभाव और आपसी द्वेष-भाव ही है.अगर सभी में विश्व-बंधुत्व की भावना हो तो क्यों इतना भयग्रस्त रहें सब.क्यों परमाणु बम ,न्युक्लियर बम ,मिसाइल आदि विध्वंशात्मक चीजों के निर्माण पर,इनके संग्रह पर जोर दिया जाएगा.

ज़रा ध्यान से सोचिये कि क्या  आज  पूरी दुनिया विध्वंश,हिंसा और द्वेष को बढ़ाने में नहीं लगी हुई है.हम सभी क्या  कभी ये सोचते हैं कि हम सभी पृथ्वी वासी उस परम सत्ता( प्रभु) के प्रति समान रुप से उत्तरदायी हैं.हमने भले ही अपनी बुद्धिनुसार अपनी अलग-अलग    सत्ताओं का निर्माण कर लिया हो पर हमारा (सम्पूर्ण सृष्टि) का राजा तो वही एक परमेश्वर है.तो लोकतंत्र वाले हों य़ा राजतंत्र वाले उनमें सर्वोपरी तो परमेश्वर ही है और सुखद पहलू ये है कि हम सबका वो शासक( प्रभु) इतना दयालू ,इतना प्रेमी और नितिवान है कि हम आँखें  मूंद कर उस पर,उसकी नितियों पर विश्वास कर सकते हैं,उन्हें अपना सकते हैं.

तो अगर हम सभी उस परम सत्ता की नितियों के अनुसरण करता बनें तो पूरी दुनिया में आपसी  सौहार्द्र का भाव पैदा हो जाएगा और फिर हम विस्फोटक सामग्री ,हिंसात्मक सामग्री पर अपनी पूँजी व्यर्थ नहीं गवाएँगे वरन उस पूँजी का उपयोग सृजनात्मक चीजों के संग्रह,परस्पर आर्थिक मदद में व्यय करेंगे .एक बार सम्पूर्ण विश्व के लोग अपनी सोच बदल कर देंखे ,सच में पूरा विश्व बदल जाएगा,पूरी सृष्टि बादल जाएगी .थोड़ी मेहनत ही तो करनी है, वो भी मानसिक.भाव बदलने है.शुद्ध करने हैं. कोई शारीरिक मेहनत नहीं करनी  अस्त्र-शस्त्र जुटाने की.व्यर्थ पैसा गंवाने की. न ही समय व्यर्थ खोना होगा युद्ध नीतियाँ बनाने में। सब कुछ आध्यात्मिक होगा, प्रेम होगा और कल्याणकारी होगा। जब सारा विश्व परिवार जैसा होगा तो कहीं भी भ्रमण करने में अपनत्व  का ही एहसास होगा।घर जैसा ही अनुभव होगा.

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