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'विकास नहीं पतन है ये'

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कहने को तो अब हम विकसित सभ्यता के मनुष्य हैं।सारी  सुविधाएँ और साधन रखते हैं फिर भी यूँ लगता है कि  सोच का विकास सही से नहीं हो पाया है,या यूं कहें की सोच की दिशा गलत हो चुकी है। सब कुछ होते हुए भी  अभाव ग्रसित सी ज़िंदगी जीना ,संपन्न संस्कृति होते हुए भी  संस्कार हीन ,मूल्य विहीन सा जीवन जीना न जाने क्यों चुन रहे हैं इसे हम पैसे होते हुए,फैशन के नाम पर कटे - फटे कपड़ें पहनना ,कपड़ा होते हुए भी छोटे -छोटे कपड़ें पहनना ये हमारा विकास है या पिछड़ापन।   पहले किसी ग़रीब व्यक्ति के फटे हुए कपड़े देख कर उस पर दया की जाती थी या किसी भी अन्य व्यक्ति के फटे  कपड़े देखकर उसकी आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता था परन्तु अब अपनी मर्ज़ी से साबुत कपड़ों को  फाड़ा जाता है और जगह-जगह कुतर कर हम अपने को स्टाइलिश और आधुनिक मानने लगते हैं।  ये आधुनिकता है तो आदिवासी  लोग तो हमसे ज़्यादा आधुनिक हैं। इधर-उधर से कुतरे कपड़ों को पहन कर हम पूरे आत्म विश्वास के साथ चलते  हैं और साबुत कपड़ों में हीनता का  भाव महसूस करते हैं। मानसिकता का इससे ज़्यादा गिरा हुआ स्तर और क्...

''स्वच्छ बनाये भारत''

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    ईश्वर  द्वारा प्रदत्त सबसे सुन्दर उपहार है 'प्रकृति'।हमारी पवित्र नदियाँ जिनका पवित्र जलआचमन कर हमारे ऋषि-  मुनि तृप्त हुआ करते हैं,जो पहाड़ हमारे ऋषि-मुनियों और संतों के आश्रय स्थल रहे हैं।  इन सबके प्रति हमें नतमस्तक होना चाहिए,सम्मान का भाव होना चाहिए और इनकी सुरक्षा के प्रति हमें सजग होना चाहिए। इन सब की सुरक्षा का ज़िम्मा हमारा है आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार से। इसलिए हम जब भी कहीं घूमने जाएँ तो इनकी स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें और इनकी महिमा,इनकी महत्ता से  सबको अवगत कराते रहें। बड़ा दुःख होता है कि हमारे अंदर अपनी इस धरोहर को सहेज कर रखने का भाव नहीं है। हम इनके प्रति अपना  कोई दायित्व नहीं समझते हैं। हम दावे तो करते हैं देश प्रेम के व इस पर मर मिटने के लेकिन देश को स्वच्छ और सुन्दर  बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना चाहते। हम कहीं भी घूमने जाते हैं  वहाँ खाने-पीने की चीज़ो के खाली रैपर  छोड़ आते हैं। डस्टबिन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं करते सिर्फ आलसी और लापरवाही  वृत्ति के कारण।  पवित्र नदियों में गन्दी चीज़े फेंक...

अंतिम सफ़र

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  मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर ज़िन्दा रहते कोई भी बात करना पसंद नहीं करता है  और मृत्यु के बाद कोई भी बात करने लायक रहता नहीं है।मृत्यु के सम्बन्ध में  सबसे बड़ी समस्या  ये है कि इसका  कोई निश्चित समय नहीं है। ये कभी भी,कहीं भी आ सकती है।अन्य  सब सामानों की तरह इंसान की  एक्सपायरी  डेट नहीं होती है.इसी अनिश्चितता की वजह से ही इंसान हर वक़्त एक अनजाने भय से ग्रसित रहता है।   ये भय हर व्यक्ति  में नहीं होता है लेकिन कुछ जो ज़िंदगी से अत्यधिक मोह ग्रसित रहते हैं और जिन्होंने भविष्य के  लिए असीमित योजनाएँ व् तृष्णाएँ पाली होती हैं उनके लिए निश्चित ही आक्रांत करने वाली होती है।  वो लोग जो ईश्वर से ज़्यादा नहीं जुड़े हैं उनके लिए ये ज़्यादा ख़तरनाक़ हो सकती है। जो लोग ईश्वर से बहुत ज़्यादा जुड़े हैं,जो प्रभु को ही सच्चा रिश्तेदार मानते हैं उनके लिए तो वो दुनिया भीअपने घर  जैसी होने वाली है. इसलिए कुछ के लिए ये जश्न है अपने प्रीतम से मिलने का और कुछ के लिए भयंकर दुःख।  ये सच है कि माया से बचना हम सांसारिक ...