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वैरागी मन

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  दिल में रम जाये जो विधाता,जग में कुछ भी रास ना आता  भौतिकता मन की प्रीति है,आत्मा की तो अध्यात्म नीति है।  रति-रीति,अनुराग,मोह सब माया की ही तो प्रतिकृति हैं, वैरागी मन का ठौर प्रभु हैं,मन में तो बस ईश स्मृति है। रागी को न ज्ञान लुभाये,बंधन में उसकी स्वीकृति है  वैरागी सत्संग का लोभी,बंधन उसके लिए विकृति है।  रागी को जग सुखमय है वैरागी की वनवास रति है  रागी  को देह की चिंता वैरागी को तन राख गति है।     

'ज़रा सोचिये '

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आवश्यकता  आविष्कार  की जननी है ( Necessity is the mother of invention) ये बहुत पुरानी  कहावत है।  कहावत के मायने भी सही हैं। वास्तव में इंसान को जब भी किसी असुविधा का सामना करना पड़ता है तो उसके  दिमाग में उस असुविधा से बचने के लिए उससे सम्बंधित कई उपाय ,कई जुगाड़ वाले विचार उत्पन्न होने लगते हैं।  फिर जन्म लेता है कोई आविष्कार।उस आविष्कार के बाद सब कुछ सही लगने लगता है।हर चीज़ में  सहूलियत हो जाती है परन्तु अगर पता चले कि जिन चीज़ों के आप आदी हो गए हैं उनके आविष्कार में कही कुछ  गड़बड़ है और आपको उनकी आदत छोड़नी पड़े तो आपको निश्चित ही बड़ा झटका लगेगा।  अब आप इस चीज़ को ऐसे समझिये। देखिये!पहले हम खाना पकाने के लिए मिटटी के चूल्हे  का इस्तेमाल कर थे।  उस पर बना खाना  हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा था लेकिन इस चूल्हे के धुएँ से परेशान इंसान ने फिर गैस चूल्हा  बना डाला। अब शोध हो रही  कि गैस वाले चूल्हे से निकली फ्लेम  पर सिकी चपाती स्वास्थ्य के लिए सही नहीं हैं। ऐसे ही पहले  हवा करने के लिए 'बीजना 'हुआ करता था। फिर टेबल ...

'विकास नहीं पतन है ये'

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कहने को तो अब हम विकसित सभ्यता के मनुष्य हैं।सारी  सुविधाएँ और साधन रखते हैं फिर भी यूँ लगता है कि  सोच का विकास सही से नहीं हो पाया है,या यूं कहें की सोच की दिशा गलत हो चुकी है। सब कुछ होते हुए भी  अभाव ग्रसित सी ज़िंदगी जीना ,संपन्न संस्कृति होते हुए भी  संस्कार हीन ,मूल्य विहीन सा जीवन जीना न जाने क्यों चुन रहे हैं इसे हम पैसे होते हुए,फैशन के नाम पर कटे - फटे कपड़ें पहनना ,कपड़ा होते हुए भी छोटे -छोटे कपड़ें पहनना ये हमारा विकास है या पिछड़ापन।   पहले किसी ग़रीब व्यक्ति के फटे हुए कपड़े देख कर उस पर दया की जाती थी या किसी भी अन्य व्यक्ति के फटे  कपड़े देखकर उसकी आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता था परन्तु अब अपनी मर्ज़ी से साबुत कपड़ों को  फाड़ा जाता है और जगह-जगह कुतर कर हम अपने को स्टाइलिश और आधुनिक मानने लगते हैं।  ये आधुनिकता है तो आदिवासी  लोग तो हमसे ज़्यादा आधुनिक हैं। इधर-उधर से कुतरे कपड़ों को पहन कर हम पूरे आत्म विश्वास के साथ चलते  हैं और साबुत कपड़ों में हीनता का  भाव महसूस करते हैं। मानसिकता का इससे ज़्यादा गिरा हुआ स्तर और क्...