'ज़रा सोचिये '
आवश्यकता आविष्कार की जननी है ( Necessity is the mother of invention) ये बहुत पुरानी कहावत है।
कहावत के मायने भी सही हैं। वास्तव में इंसान को जब भी किसी असुविधा का सामना करना पड़ता है तो उसके
दिमाग में उस असुविधा से बचने के लिए उससे सम्बंधित कई उपाय ,कई जुगाड़ वाले विचार उत्पन्न होने लगते हैं।
फिर जन्म लेता है कोई आविष्कार।उस आविष्कार के बाद सब कुछ सही लगने लगता है।हर चीज़ में
सहूलियत हो जाती है परन्तु अगर पता चले कि जिन चीज़ों के आप आदी हो गए हैं उनके आविष्कार में कही कुछ
गड़बड़ है और आपको उनकी आदत छोड़नी पड़े तो आपको निश्चित ही बड़ा झटका लगेगा।
अब आप इस चीज़ को ऐसे समझिये। देखिये!पहले हम खाना पकाने के लिए मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल कर थे।
उस पर बना खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा था लेकिन इस चूल्हे के धुएँ से परेशान इंसान ने फिर गैस चूल्हा
बना डाला।
अब शोध हो रही कि गैस वाले चूल्हे से निकली फ्लेम पर सिकी चपाती स्वास्थ्य के लिए सही नहीं हैं।
ऐसे ही पहले हवा करने के लिए 'बीजना 'हुआ करता था। फिर टेबल फैन ,फिर सीलिंग फैन ,फिर कूलर और फिर
आया A.Cकूलर की समस्याओं से बचने के लिए A.C का अविष्कार हुआ लेकिन अब वही A.Cबहुत
ख़तरनाक बताया जा रहा है ,स्वास्थ्य के लिए।
ऐसे ही पहले,मिटटी तांबे,लोहे और स्टील आदि के बर्तन स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते थे और उनका ही
उपयोग भी होता था लेकिन फिर शुरू हुए प्लास्टिक,बोन चाइना,एल्युमिनियम आदि अन्य धातु के बर्तन जो अब
खतरनाक घोषित किये जा रहे हैं।अब हर नई शोध में हर नई आविष्कार की गई चीज़ के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं।
ये ही बड़ी बीमारी के लिए उत्तरदायी भी मानी जा रही हैं ।
ऐलुमिनियम,पीतल,प्लास्टिकआदि सब हानिकारक सिद्ध हो चुके हैं।
खाने-पीने की चीज़ों को लें तो इनमें चाय, जिसकी लगभग सारी दुनिया दीवानी हो चुकी है उसके भी अब
कई दुष्प्रभाव बताये जा रहें है.ये अलग बात है कि कुछ रिसर्चर इसके बहुत से लाभ भी बता रहे हैं। अब
अधिकतर शोध के अनुसार पुरानी चीजें ,पुराने खान-पान के नियम ,पुरानी सभ्यता ही श्रेष्ठ बताई जा रही हैं.
कुल मिला कर अब हम भ्रमित हैं और ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि सभ्यता का विकास सही है या उसका
पिछड़ापन ही सही था।
आज मिट्टी के बर्तन सही बताये जा रहें हैं,प्राकृतिक रौशनी की महत्ता बताई जा रही है,शारीरिक मेहनत को
महत्त्व दिया जा रहा है।हर कार्य हाथों से करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
सभ्यता के विकास से पहले तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं थे तो पत्तो को ढककर काम चलाया जा रहा था। आज
कपड़ों की व्यवस्था भी है। सब संभव और उपलब्ध है फिर भी साबुत कपड़ो को चिथड़े की फॉर्म में पहना जा रहा
है। जगह -जगह से कुतर कर ,या नाम मात्र के कपड़े पहन कर उसी अविकसित,आदिवासी युग में पहुँचने की
होड़ हो रही है।
तो अब ये समझना मुश्किल है कि वो सारी चीज़ें जो नया आविष्कार हैं अगर ग़लत हैं तो आविष्कार किया
ही क्यों गया।
ये सब चीज़ें हानिकारक हैं तो सोच-समझकर क्यों नहीं बनायीं गयीं। मार्केट में लायी ही क्यों गयी।
जब अब हानिकारक बताई जा रहीं हैं तो इन सभी को पूर्णतया प्रतिबंधित करें और कुछ नया स्वास्थ्य और सभ्यता
के अनुकूल लाएं।
पहले बड़े ज़ोर-शोर से किसी चीज़ का आविष्कार किया जाता है और कुछ समय बाद वही रिजेक्ट भी हो जाती है।
तो सब कुछ सोच-समझकर बनाये और उसका भविष्य देखें।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed