वैरागी मन

 






दिल में रम जाये जो विधाता,जग में कुछ भी रास ना आता 

भौतिकता मन की प्रीति है,आत्मा की तो अध्यात्म नीति है। 

रति-रीति,अनुराग,मोह सब माया की ही तो प्रतिकृति हैं,

वैरागी मन का ठौर प्रभु हैं,मन में तो बस ईश स्मृति है।

रागी को न ज्ञान लुभाये,बंधन में उसकी स्वीकृति है 

वैरागी सत्संग का लोभी,बंधन उसके लिए विकृति है। 

रागी को जग सुखमय है वैरागी की वनवास रति है 

रागी  को देह की चिंता वैरागी को तन राख गति है। 



 




 


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