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आध्यात्मिकता विज्ञान के लिए चुनौती

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आध्यात्मिकता और विज्ञान परस्पर विरोधी हैं अगर आध्यात्मिकता को सही से ना समझा जाए।  दोनों दृष्टिकोण एक साथ में लेकर चलना अच्छा है मगर बड़ा मुश्किल भी।काफी कुछ विरोधाभाषी है परस्पर,   क्योंकि आध्यात्मिकता जिन चीज़ों को स्वीकार करती है विज्ञान अक्सर उन्ही चीज़ों को अस्वीकार करता  है. हम चाहे कितना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख लें मगर ईश्वर और अध्यात्म के स्वीकरण के बिना सब बेमानी है। विज्ञान ने चाहे कितनी ही तरक्की की हो,कितना ही सशक्त बन गया हो लेकिन सृष्टि के रचयिता की गढ़ी चीज़ों की  गणित कभी-कभी वह भी समझ नहीं पाता है।  विज्ञानं और वैज्ञानिक स्वं जिससे उत्पन्न हुए हों उससे  बराबरी आख़िर कैसे हो सकती है । ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो ये सिद्ध करती हैं कि उस सृजनकर्ता के सामने हमारी सामर्थ्य कुछ नहीं है। कई ऐसी चमत्कारिक घटनाएँ हैं जो विज्ञान से कहीं ज़्यादा ईश्वर पर ,आध्यात्मिकता पर विश्वास करने को विवश करती हैं।   कुछ उदहारण यहाँ देखिये -1भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में लगा ध्वज हवा से विपरीत दिशा में ही क्यों उड़ता है।  2. जयपुर के गोपेश्वर नाथ जी मंद...

वैरागी मन

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  दिल में रम जाये जो विधाता,जग में कुछ भी रास ना आता  भौतिकता मन की प्रीति है,आत्मा की तो अध्यात्म नीति है।  रति-रीति,अनुराग,मोह सब माया की ही तो प्रतिकृति हैं, वैरागी मन का ठौर प्रभु हैं,मन में तो बस ईश स्मृति है। रागी को न ज्ञान लुभाये,बंधन में उसकी स्वीकृति है  वैरागी सत्संग का लोभी,बंधन उसके लिए विकृति है।  रागी को जग सुखमय है वैरागी की वनवास रति है  रागी  को देह की चिंता वैरागी को तन राख गति है।     

'ज़रा सोचिये '

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आवश्यकता  आविष्कार  की जननी है ( Necessity is the mother of invention) ये बहुत पुरानी  कहावत है।  कहावत के मायने भी सही हैं। वास्तव में इंसान को जब भी किसी असुविधा का सामना करना पड़ता है तो उसके  दिमाग में उस असुविधा से बचने के लिए उससे सम्बंधित कई उपाय ,कई जुगाड़ वाले विचार उत्पन्न होने लगते हैं।  फिर जन्म लेता है कोई आविष्कार।उस आविष्कार के बाद सब कुछ सही लगने लगता है।हर चीज़ में  सहूलियत हो जाती है परन्तु अगर पता चले कि जिन चीज़ों के आप आदी हो गए हैं उनके आविष्कार में कही कुछ  गड़बड़ है और आपको उनकी आदत छोड़नी पड़े तो आपको निश्चित ही बड़ा झटका लगेगा।  अब आप इस चीज़ को ऐसे समझिये। देखिये!पहले हम खाना पकाने के लिए मिटटी के चूल्हे  का इस्तेमाल कर थे।  उस पर बना खाना  हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा था लेकिन इस चूल्हे के धुएँ से परेशान इंसान ने फिर गैस चूल्हा  बना डाला। अब शोध हो रही  कि गैस वाले चूल्हे से निकली फ्लेम  पर सिकी चपाती स्वास्थ्य के लिए सही नहीं हैं। ऐसे ही पहले  हवा करने के लिए 'बीजना 'हुआ करता था। फिर टेबल ...