संदेश

''मत भूलो ये भारत है''

चित्र
शादी की उम्र बढ़ाना और लिवइनरेलशनशिप को छोटी उम्र में ही परमिशन देना,समलैंगकिक विवाह की अनुमति  के समर्थन की बात करना। ये सब क्या मज़ाक है?कैसा  खिलवाड़ है संस्कृति के साथ। आखिर हम देश की संस्कृति का कचरा करने पर क्यों लगे हुए हैं। करना क्या चाह  रहे हैं ?क्या हम सभी को व्यभिचारी बनाना चाहते हैं? जो संस्कृति अपनी विशिष्टता के लिए विश्व भर में प्रसिद्द है उसे क्यों नष्ट करना चाह रहे हैं। जिस देश की शिक्षा में  संस्कार और मर्यादा की बात प्रमुख रूप से होती है और बाकी सब ज्ञान बाद में उस देश की पहचान हम क्यों  मिटाना चाहते हैं।मानती हूँ  की महिलाओं के विकास और शिक्षा व्यवस्था पर भी  उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है   जितनी की पुरुषों पर। दोनों को समान उन्नति के अधिकार मिलने ज़रूरी हैं।परन्तु वर्तमान में दोनों को ही उन्नति के  नाम पर जो स्वतंत्रता दी जा रही है वो उचित नहीं है।महिलाओं ने तो स्वतंत्रता के नाम पर हद  ही कर दी है न तो  पहनावे में शालीनता बची है और न ही आचरण में. जिस देश में आत्म सम्मान की और चरित्र की रक्षा हेतु तमाम नारियाँ जौ...

"फौजी भाई"

चित्र
अपने लिये तो सभी जीते हैं जो दूसरों  के  लिए ज़िये वही मनुष्य है.हमारे देश के सुरक्षा प्रहरी,हमारे शेर दिल फौजी भाई इस कसौटी पर खरे उतरते हैं. प्रणाम हैं इनके ज़ज्बे को,इनकी श्रेष्ठता को,इनके साहस और शौर्य को. सामान्य उद्देश्य से जीने  के अवसर तो सभी को मिलते हैं मगर किसी विशिष्ट उद्देश्य (परमार्थ हेतु) हेतु मरने का अवसर यूँही नहीं मिलता.हमारे फौजी भाई चुनते हैं इस अवसर को और अजर-अमर हो जाते  हैं .तभी तो  इनकी  तुलना  संतों  से की  जाती  है.इन्हे  त्यागना  पड़ता  है हर चीज का मोह,जीना  होता है सिर्फ देश के लिये .देश ही इनके लिये भगवान  होता है और सारे कर्तव्य और कर्म  भी इसके लिये.इसलिए ये ही सच्चे हीरो हैं।ये ही विशिष्ट सम्मान के अधिकारी हैं।ये ही प्रशंसा के पात्र हैं।ये ही देश के अमूल्य रत्न हैं।अपनी जान बचाकर जीना तो कायरो का काम है.दूसरों  की जान  बचाकर जो शहीद हो जाये वही सच्चा इंसान है, सेना का जवान है .हम अपने घर मे आराम से  जो खा पी रहे हैं उसके पीछे इनके कितने ही भूखे पेट बीते दिन हैं.हम...

'शुद्ध भक्ति'

चित्र
'शुद्ध भक्ति ' शब्द को सुनकर मन में सभी के दिल में ये ख्याल तो ज़रूर आया होगा की भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध  का क्या मतलब हुआ। दरअसल भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध का सम्बन्ध भक्त की भावना से होता है। भक्त भी दो तरह के होते हैं- एक वो जो अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ती हेतु भक्ति करते हैं,जगह जगह के मंदिरों में  जाकर पूजा अर्चना करते हैं,धोक लगाते हैं कि अमुक समस्या या दुःख खत्म हो जाएगा तो इतने का प्रसाद चढ़ाएंगे  या कोई भी कार्य।कुछ मामलो में तो दूसरों के अहित की कामना से भी कुछ लोग पूजा करते हैं. सही इच्छाओं की पूर्ती के लिए की गई पूजा में  कोई बुराई नहीं है लेकिन ग़लत इच्छाओं के लिए की गई पूजा भी  पाप कर्म में ही आती है।सबसे निकृष्ट लोग वही होते हैं जो भक्ति की आड़ में अपनी ग़लत इच्छाओं की पूर्ती की  कामना रखते हैं।इनकी कोई कामना तंत्र -मंत्र से पूरी हो भी जाये तो ऐसे लोगो का अंत बड़ा भयावह होता है। ये ज़िंदगी मौत के बीच में झूलते रहते हैं और बड़ी ही दर्दनाक मौत होती है इनकी,और प्रेत योनि में जाते हैं। दूसरी भक्ति होती है-निःस्वार्थ भक्ति जिसमें कोई इच्छा नहीं होती।बस प्...