संदेश

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दुनिया में हर व्यक्ति की अपनी अलग मनोवृत्ति है, अपना व्यवहार होता है और दूसरे हमें सिर्फ अनुमान के आधार पर ही जानते हैं.हम जैसे हैं वैसे रूप में हमें कोई -कोई ही समझता है।अगर कोई सही से समझ पाता है तो उससे संबंध अच्छे हो जाते हैं जो सही से नहीं समझ पाते उससे संबंध ख़राब हो जाते हैं। यहाँ पूरी दुनिया एक दूसरे के व्यवहार को अनुमान और अपनी कल्पनाओं के आधार पर ही ग्रहण करती है इसलिए ये सोच कर दुखी नहीं होना चाहिए की अमुक व्यक्ति हमें सही से नहीं समझता.हमें हमारे प्रभु सही से समझे बस। बाकी किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। किसी सामान्य व्यक्तित्व में इतनी क्षमता नहीं कि किसी अन्य व्यक्ति को सही से समझ सके। ये कार्य सिर्फ ईश्वर से जुड़ा, पवित्र हृदय का व्यक्ति ही कर सकता है .इसलिये प्रभु की नजर में सही बने रहकर निश्चिंत हो कर, हर काम कीजिए और मस्त रहिए।आपको सिर्फ प्रभु को प्रसन्न करना है सांसारिक लोगो को तो कोई कभी खुश कर ही नहीं पाया।उनके पास तो सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची और उलाहने ही होते हैं। प्रभु के बनकर रहिए और सब प्रभु पर छोड़ दीजिए.कोई आपकी चिंता करे, आपको सही से समझ पाए तो ठीक अन्यथा ...

'समझ'

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दुनिया बड़ी विचित्र है यहां सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और सबको ही एक दूसरे से शिकायत है।यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके सबके साथ संबंध अच्छे हों फिर भी दूसरे को खुद से निम्न और खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर चलते हैं. जरा विचार कीजिए अगर दोनों अच्छे होते तो ना एक दूसरे से दोनों को शिकायत होती न झगड़े.सारी समस्या का कारण है अपेक्षा, उम्मीद।अगर आप किसी से उम्मीद रखते हैं कि वो आपके अनुसार बने तो आपको भी उसके अनुसार बनना होगा।अन्यथा शिकायत करना बंद करे।जब आप खुद को बदलना नहीं चाहेंगे तो दूसरे से उम्मीद क्यों? इसलिए सुखी रहना है तो इच्छाओ पर नियन्त्रण रखें।दूसरो से सुख पाने की नहीं, सबको सुख देने की इच्छा रखें.जब तक स्वार्थी बने रहेंगे, सुख भोगने की इच्छा रखेंगे और दूसरे को अपने अनुकूल बनने की कोशिश करते रहेंगे तब तक दुख से नहीं बच पाओगे.और यहीं सारी उम्मीद क्लेश, द्वेष और विवाद उत्पन्न करती रहेंगी।जब तक मेरा - मेरा का भाव ख़तम नहीं होगा तब तक दूसरे के प्रति सहनुभूति और प्रेम का भाव नहीं होगा।और स्वार्थ और अपेक्षा ही दुख का मूल कारण है।उमर के अनुसार इच्छाएं और व्यवहार  पर...

कर्मा

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सृष्टि में जितने भी इंसान हैं सब प्रभु की मर्जी से प्रकट हुए हैं .लेकिन साथ ही सब अपना अपना प्रारब्ध, संचित कर्म लेकर चल रहे हैं।मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ योनि मानी जाती है।अन्य सारी योनि तो भोग योनि है लेकिन मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जो अपने वर्तमान कर्मों के हिसाब से अच्छा या बुरा फल भोगती है और अच्छे कर्म करके ईश्वर की प्राप्ति भी कर सकती है इस योनि में जो भी कर्म करे बहुत सोच समझ कर करे। क्योंकि इस योनि में अगर आपने ईश्वर प्राप्ति नहीं की तो आपको अनेक योनियों में भटकना बढ़ेगा।मनुष्य शरीर पाकर इसलिए कोई भी गलत कर्म न करें.आप जिसके प्रति भी गलत कर्म करेंगे वो किसी ना किसी रूप में आपके सामने अगले जन्म में प्रकट होता रहेगा।इसलिए मोह का नाश करते हुए, विवेकशील बनते हुए हमें अध्यात्म और ईश्वर से जुड़कर अपनी जिंदगी सिर्फ कर्तव्य निर्वाह के लिए जीनी है.किसी की भी आत्मा को दुखाना या ईश्वर द्वार निर्मित इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति की शारीरिक कमज़ोरी या मानसिक कमज़ोरी का उपहास करना, मज़ाक उड़ाना बहुत घातक हो सकता है  .यहां जिसको जो स्थिति मिली है सब अपने कर्मनुसर मिली है।इसलिए आप जिसका भ...