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भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'

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जिंदगी को हंस के जिओ. हर बात पे मुंह फुलाना या सीरियस होना जरूरी नहीं है मैं तो कहती हूं लड़ाई में भी हसी  खोजो.बीच में भाव बदल के चुटकुले सुनाने लगो.कह दो के लड़ने का मन नहीं है.कुछ और सुना... सब दिमाग का खेल है मनोवृत्ति का खेल है.आपके हाथ में है क्यों दूसरे के खोपड़े के हिसाब से चलना. बाकी आपकी मर्जी..उसे चढाने दो त्यौरियां .तुम्हें प्रभावित ही नहीं होना है .तुम्हें ऐसा बन जाना है मानो सामने एक नादान बालक खड़ा है . जब तक विषय कोई ज़्यादा गंभीर न हो ,जैसे देश ,धर्म और मर्यादा के ख़िलाफ़ कोइ बात ,तब तक किसी विषय पर ज़्यादा तमतमाने की ज़रूरत नहीं है .न्याय संगत बात के लिए,नैतिकता के लिए लड़ाई सही,बाकी सब व्यर्थ है.इसलिए मौन रहना सीखो,भीतर ही भीतर प्रभु का चिंतन कर प्रसन्न रहना सीखो.प्रभु प्रेम रस का पान करो फिर बाहर सब फीका और रस हीन लगेगा.भीतर की दुनिया में जीना सीखो।तब जान पाओगे बाहर कुछ भी नहीं है।कुछ भी सुंदर नहीं है।जहां आनंद खोज रहे हो है ही नहीं।शांत रहकर प्रभु में खोने का आनंद जिसने पाया उसे बाहर की चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। इसलिये भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें बाहर तो कुछ भ...

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

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   मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह  करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर.  मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम  ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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दुनिया में हर व्यक्ति की अपनी अलग मनोवृत्ति है, अपना व्यवहार होता है और दूसरे हमें सिर्फ अनुमान के आधार पर ही जानते हैं.हम जैसे हैं वैसे रूप में हमें कोई -कोई ही समझता है।अगर कोई सही से समझ पाता है तो उससे संबंध अच्छे हो जाते हैं जो सही से नहीं समझ पाते उससे संबंध ख़राब हो जाते हैं। यहाँ पूरी दुनिया एक दूसरे के व्यवहार को अनुमान और अपनी कल्पनाओं के आधार पर ही ग्रहण करती है इसलिए ये सोच कर दुखी नहीं होना चाहिए की अमुक व्यक्ति हमें सही से नहीं समझता.हमें हमारे प्रभु सही से समझे बस। बाकी किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। किसी सामान्य व्यक्तित्व में इतनी क्षमता नहीं कि किसी अन्य व्यक्ति को सही से समझ सके। ये कार्य सिर्फ ईश्वर से जुड़ा, पवित्र हृदय का व्यक्ति ही कर सकता है .इसलिये प्रभु की नजर में सही बने रहकर निश्चिंत हो कर, हर काम कीजिए और मस्त रहिए।आपको सिर्फ प्रभु को प्रसन्न करना है सांसारिक लोगो को तो कोई कभी खुश कर ही नहीं पाया।उनके पास तो सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची और उलाहने ही होते हैं। प्रभु के बनकर रहिए और सब प्रभु पर छोड़ दीजिए.कोई आपकी चिंता करे, आपको सही से समझ पाए तो ठीक अन्यथा ...