हद है कहूँ तो

मोहब्बत में किसी की खुद को मिटाना हद है कहूँ तो
रातों को उठ -उठ  आंसू बहाना हद है कहूँ तो
गए अब लैला ,मजनू के ज़माने
प्यार की क़समें यूँ खाना हद है कहूँ तो
ये इश्क आज -कल का सच्चा नहीं होता
तन्हाइयों में दिल को जलाना हद है कहूँ तो
दिल की लगी से कुछ हासिल नहीं होगा
बग़ावत उसूलों से करना हद है कहूँ तो।
इस आवारा दिल की फ़ितरत अजब है
बातों में इसकी हर बार आना हद है कहूँ तो । 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'