'पोको '(kitten)
सर्दी के दिन थे.वो अपनी माँ के संग मेरे घर पर आया था .वो इतना छोटा सा और प्यारा था कि कोई भी सरल ह्रदय वाला व्यक्ति उसके मोह-पाश से बच नही सकता था.रंग तो साँवला था मगर आकर्षक बहुत था.उसकी माँ भी सुन्दर और गौर वर्ण की थी.सर्दी के मौसम की वजह से मन चाह रहा था कि उन दोनों के लिए घर में ही रहने की कोई व्यवस्था कर दी जाए मगर फिर इमोशन को कन्ट्रोल करते हुए सोच को व्यवहारिक किया. दरअसल ये माँ और बेटे एक बिल्ली और उसका बच्चा थे.खैर बिना ज्यादा दिमाग लगाए मैने उन दोनों के लिए खाने -पीने का कुछ इंतजाम किया.उन दोनों के लिए दूध और बिस्किट उपलब्ध कराए गए, पर्याप्त न पड़ने पर चपाती भी बनाई गई . दोनों खा-पीकर बाहर ही खड़े स्कूटर के कवर में दुबक कर सो गए.सुबह फिर दूध पीकर पता नही कहाँ चले जाते.अब रोज ये ही सिलसिला चलता रहा .बच्चा बड़ा हो रहा था और माँ का उसके प्रति मोह कम .धीरे -धीरे दोनों में झगड़े शुरू हो गए दूध और इलाके को लेकर शायद.अब माँ चूँकी उसके प्रति क्रूर हो गई थी मैंने भी उसको दूध देना बंद कर दिया था क्योंकि अपनी माँ से डरा,सहमा वह कई बार पेड़ पर चढ़ने का दुस्साहस भी कर चुका था,माँ भी समझ चुकी थी कि अब उसे यहाँ प्यार नही मिलता.अब उसका बेटा जिसका नाम हमने 'पोको 'रखा था रोज निडर होकर आता था.सुबह -शाम एक कटोरा दूध पीकर चला जाया करता था.रात जाने कहाँ गुजारता था पता नही.करतब बहुत मजेदार दिखाता था.उसको कहते 'पोको 'पल्टी खाओ तो दाएँ -बाएं पल्टी खाता था.कभी चप्पल को पहनने की कोशिश करता था. कभी डोर-मैट को सिर पर टोपी की तरह पहन लेता था.हेलो कहने पर हाथ मिलाता था.उससे हम पूछते कोलॉनी का दादा कौन है,कहता !मियाऊँ=मै हूँ.अपनी माँ का शैतान बालक कौन हैं =मियाऊँ, लेकिन एक दिन उसकी माँ वापस आई उसके दूसरे बच्चे के साथ.दो दिन तक मैने उसके दूसरे बच्चे को देखा आस-पास ही.वो बच्चा भी पोको जैसा ही था लेकिन गौरा और लाल होठों वाला था थोड़ा ज़्यादा ख़ूबसूरत और मासूम सा.तीसरे दिन मैने देखा कि वह पास के ही घर में मरा हुआ पड़ा था और उसकी माँ उसकी पैर की हड्डी चबा रही थी.उसी दिन से उसकी माँ जिसका नाम मैने (मिट्सी ) रखा था मेरी नजरों से गिर गई थी.साथ ही पोको भी शक के घेरे में था.शायद दूसरे भाई के प्रति जलन के भाव की वजह से उसने ही उस नन्हे से बच्चे को मारा हो इसलिये अब उन दोनों के प्रति मेरा प्यार नफरत में बदल चुका था.एक दिन पोको को मैने घर से बाहर बिना दूध पिलाए ही निकाल दिया हालाकि उसके प्रति जो इतने समय का प्यार था उसे भुलाना और उसके प्रति इतना कठोर बनना आसान काम नही था फिर भी दिल पर पत्थर रख कर हमने वो निर्णय लिया. पोको हमारे परिवार का ही नही आस-पास के बच्चों का ,हर आने -जाने वालों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र था.अब भी उसकी बहुत याद आती है लेकिन उसके प्रति वो सन्देह, मेरा मन बदल देता हैं .
-अंशु चौहान

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