'मारसाहब'
हमारे बचपन में ,गुरु का मतलब होता था -मारसाहब। जी हाँ ये शब्द तो था 'मास्टर साहब 'मगर उस समय में हमारे ये गुरूजी (मारसाहब ) स्टूडेंट्स की इतनी पिटाई किया करते थे कि इनका नाम करण ही मास्टर साहब से 'मारसाहब' हो गया था। गिनती न आने पर,सवाल न आने पर बेंत की एक लकड़ी मंगाई जाती थी,जिसे स्थानीय भाषा में (संटी ) कहा जाता था। इस लकड़ी से मास्टर जी विद्यार्थियों के हाथ सूता करते थे। कई -कई शिक्षक तो बिना सोचे समझे कनपटी पर इतनी तेज खींच कर चाटा मारा करते थे कि चक्कर आने लग जाते थे, बेचारे स्टूडेंट को।भगवान का शुक्र है कि आज के समय में कुछ एक अपवाद को छोड़कर सभी शिक्षक फ्रेंडली और कूल स्वभाव के होते हैं.
क्या किसी को भय ग्रसित करके कुछ सिखाया जा सकता है ?शिक्षा तो विनम्रता ,सहनशीलता और स्नेह से पूर्ण व्यक्ति ही दे सकता है। शिक्षा प्रदान करने वाला जब तक खुद मानवीय गुणों और मृदु व्यवहार से युक्त नहीं होगा तब तक न तो वह ख़ुद शिक्षा देने का अधिकारी है न ही विद्यार्थी उससे शिक्षा ग्रहण करने में रूचि रखने वाला होगा।
आज कानून ने स्टूडेंट्स को कुछ सुरक्षा अधिकार प्रदान किए हैं। आज कोई भी शिक्षक अपने शिष्य पर हाथ उठाता है, उसकी पिटाई करता है तो ये दंडनीय अपराध है। पहले भी यूँ तो अच्छे शिक्षक हुआ करते थे मगर पाँचवी कक्षा तक हमें तो ऐसे ही शिक्षकों का सामना करना पड़ा। हालाँकि हम इस तरह की सज़ाओं से बचे रहे मगर अपने कई साथियों को हमने बड़े ही क्रूर तरीके से उन मास्टरजी द्वारा पिटते हुए देखा है।
पीटने की बीमारी इस क़दर फैली हुई थी कि कक्षा में अध्ययनरत अपने पुत्र को भी शिक्षक उतनी ही बेरहमी से 'सन्टी'द्वारा सूता करते थे और रोते-रोते वह बेचारा किसी तरह पहाड़े सुनाया करता था,वो भी एक इकाई,दो इकाई ....वाले (हिन्दी) में सिसकियाँ लेते हुए। तब हमारी नज़रों में शिक्षक की छवि लकड़ी से पीटने वाले एक क्रूर इंसान की ही होती थी बस ।
पीटने की बीमारी इस क़दर फैली हुई थी कि कक्षा में अध्ययनरत अपने पुत्र को भी शिक्षक उतनी ही बेरहमी से 'सन्टी'द्वारा सूता करते थे और रोते-रोते वह बेचारा किसी तरह पहाड़े सुनाया करता था,वो भी एक इकाई,दो इकाई ....वाले (हिन्दी) में सिसकियाँ लेते हुए। तब हमारी नज़रों में शिक्षक की छवि लकड़ी से पीटने वाले एक क्रूर इंसान की ही होती थी बस ।
अब जाकर शिक्षक की परिभाषा और छवि चेंज और स्पष्ट हुई। अन्यथा गुरु का मतलब ,मास्टर जी और मास्टर जी का मतलब ,मारसाहब।अब लगता है कि शिक्षक तो ज्ञान देने वाला,अधूरे ,अनगढ़ व्यक्तित्व को पूर्ण और परिष्कृत बनाने वाला होता है। जीवन को सही राह दिखाने वाला और विपरीत परिस्थिति में मनोबल बढ़ाकर भविष्य को सही दिशा दिखाने वाला होता है। आज के उन पथ प्रदर्शक शिक्षकों को मेरा सादर नमन जो सभी मानवीय गुणों से पूर्ण और मृदु स्वाभाव धारी हैं .
-अंशु चौहान
Thanks
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