'नन्ही दुलारी '
पापा के काँधे पर रख सिर ,वो जाने कब सो जाती थी
आँख खुले तो माँ फिर उसको ,लोरी गा के सुलाती थी
जिसके हँसने पर खुश होते ,रोने पर मुर्झाते थे
अपने सब सपनों की बलि वो, जिसके लिए चढ़ाते थे
सोच -सोच आज चिंतित हैं बैठे
हो कर सयानी कैसे गुज़रेगी ,दहशत भरी उन राहों से
जहाँ डगर -डगर पर मैले मन का,हर एक अमानुष बैठा है |
स्नेह -दुलार से पली -बढ़ी ये ,कैसे जग की कुटिल चाल पढ़ पाएगी
नाज़ुक मन ,कोमल शरीर से ,दुष्टों का कैसे वध कर पाऐगी
जहाँ कन्या से लेकर वृद्धा तक की ,अस्मत को ही ख़तरा हो
उस धरा पर नामुमकिन है कन्या -अभिभावक, दुश्चिंताओं से मुक्त रहें
अब चिंता बेटी के मात-पिता की ,अपनी चिंता बनालो
वरना पाप ,अधर्म का खुद को ,भागीदार कहला लो
नन्ही -नन्ही कलियाँ भी जहाँ, पशु पैरों से रोंदी जाऐगी
उस गुलशन की फुलवारी का,संरक्षण आख़िर कैसे होगा
हुआ नारी मन पीड़ित ज़रा भी ,अभिशापित पूरा जगत होगा | |
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Sundar kavita
जवाब देंहटाएंBahut-bahut dhanyawad
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