'खलिश'


 साँसें लूँ तो धुँआं सा उठता है

दिल जाने क्यों सुलगा सा अंगार रहता है  

बेखयाली सी रहती है निगाहों में अक्सर 

नींद ना आए तो आँखों को मलाल रहता है   .

हर प्रहर में ज़िक्र उठा लेती हूँ तेरा  

भूल जाऊँ तो दिल को आराम रहता है 

खाली है वो शहर भी तेरे अहसासों से अब 

मेरी यादों में ही बस वो आबाद रहता है

इस दर्द की दवा भी बना ना सका कोई 

इश्क का मारा  ताउम्र बीमार रहता है .

-अंशु चौहान   





 






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