'तेरी भक्ति में मैं '


निर्लिप्त,निर्दोष,बेगुनाह हो गया हूँ 

तेरी भक्ति से पाक-निगाह हो गया हूँ 

लोभ,मोह,बेवजह का भटकाव मिट गया है  

ज़िन्दगी की दुश्चिंताओं से बेपरवाह हो गया हूँ

तू मुझमें जब से बैठा है सुकूँ बनके यकीं कर,

मैं फ़कीरी में भी बादशाह हो गया हूँ 

तुझसे मेरी नजरों का मिलना भी गज़ब था

मोहब्बत में तेरी फनां हो गया हूँ

शुरू तुझसे हुआ,खत्म भी तुझमें रहूँगा

मैं दिल से तेरी पनाह हो गया हूँ

मुझमें बाकी हैं अब क्या,चन्द सांसों का सफर है

मेरी मंजिल तू ही,मैं आगाह हो गया हूँ.          -

-अंशु चौहान

                    

     

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