लो आज़ाद किया तुमको
लो आज़ाद किया अब तुमको
अब ख़ुशबू बन बिखरो इन फ़िज़ाओं में
मुझ में सिमट कर घुट जाओगे
क्या रक्खा है इन सीमाओं में
यहाँ तुम्हारे रूप-रंग की चर्चा नहीं करने वाला
उस गुलशन की शान बनो तुम
क्या रक्खा है फ़िज़ूल अदाओं में
रख सकता हूँ अहसास तेरा तो
उस दूरी से भी मै हरपल
मुक्त करो ख़ुद को अब तो
क्या रक्खा है इन सज़ाओं में
बस गई है सुगंध यूँ तो तेरी
हर शय में, हर पैमाने में
जाने दो रुख़सत करता हूँ
क्या रक्खा है इन सदाओं में।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed