ए पुरूष! (Poem)
ए पुरूष! तू जिससे उत्पन्न हुआ
जिसके संरक्षण में रहकर खड़ा हुआ
जिसकी लोरी सुनकर बड़ा हुआ
जिसके ममत्व भरे स्पर्श से जागृत हुआ
जिसका मन तेरी पीड़ा से द्रवित हुआ
जिसकी छाती से लग तू,करुण रुदन से मुक्त हुआ
असहाय ,विवश ,वही दीन -हीन तू ,उस पर अब बल आज़माता है .
मत भूल वो जगत जननी है
तुझे जीवन उससे प्राप्त हुआ
तू याचक,आश्रित उसके आगे हरदम
वो तेरी जीवन दायनी है
उसी नारी हित मन में ग़र तेरे सम्मान नहीं
तू पतित ,अधर्मी ,दुराचारी ,
मृत्यु- दण्ड अधिकारी है .
-अंशु चौहान

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