घातक है अधूरा ज्ञान
अपूर्वः कोपि कोषोयं विद्यते तव भारति,व्ययतो वृद्धिमायाति,क्षयमायाति संचयात।
इस श्लोक में कहा गया है कि विद्द्या रुपी ये जो ज्ञान का कोष है ये बड़ा अद्भुत है, इसे जितना ख़र्च किया जाता है
उतना ही बढ़ता है।अर्थात विद्द्या (ज्ञान) जितना बाँटा जाए उतना ही इनका फायदा रहता है,बांटने
वाले को भी और ग्रहण करने वाले को भी।बस इसमें सावधानी ये बरतनी होती है कि ये सही व तथ्य पर
आधारित होना चाहिए क्योंकि किसी भी चीज़ का ग़लत ज्ञान,अर्थ का अनर्थ कर देता है।कई बार किसी बात,किसी
कहावत,किसी दोहा,किसी चौपाई का सही अर्थ नहीं लगाया जाता है और कुछ तर्कों को हम अपनी सुविधानुसार
अपने हिसाब से,अपने हित में परिवर्तित भी कर लेते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे -
रामचरितमानस की इस चौपाई को ही ले लीजिए -
''प्रभु भल कीन्ह,मोहि सिख दीन्हीं,
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही,
ढोल,गवार ,शूद्र ,पशु ,
नारी सकल ताड़ना के अधिकारी''।
उपर्युक्त चौपाई का अर्थ अधिकतर ग़लत ही समझा जाता है।यही कारण है कि इस चौपाई को लेकर नारी जाति में
विरोधी भावना उपजी हुई है।
महिलाएं अकसर इस चौपाई को पढ़कर आहत होती हैं और कई महिलाएँ अज्ञानता के कारण इसे पढ़ना ही पसंद
नहीं करती हैं.कई पुरुष भी इसका सही अर्थ नहीं समझते हैं. वो समझते हैं कि स्त्री प्रताड़ना की अधिकारी होती है।
सभी के द्वारा 'ताड़ना 'शब्द का सामान्यत:अर्थ पीटने से ही लिया जाता है जबकि यहाँ इसका अर्थ पीटना नहीं
बल्कि ध्यान देने से,देखभाल से है।
अर्थात यहाँ इसका अर्थ है कि ढोल,गँवार ,शूद्र,पशु और नारी इन सभी को अतिरिक्त देखभाल की ज़रूरत होती है
ताकि उचित रूप से अपना कौशल दिखा पाएँ।
नारी के लिए ताड़ना का अर्थ है कि उसे उसके चेहरे के भावों से ही सरलता से समझा
जा सकता है की उसके मन में क्या चल रहा है।अर्थात वह खुश है या नहीं यह देखने की ज़रूरत है। साथ ही
सूर्पनखा जैसी औरतों के मामले में इसे प्रताड़ित करने के अर्थ में भी लिया जा सकता है।इसलिए किसी भी बात को
उसके प्रसंग के अनुकूल समझना चाहिए।तुलसीदास जैसे इतने विद्वान व्यक्ति और प्रभु राम के साथ ही माता सीता
को भी उतना ही आदर देने वाले तुलसीदास ऐसा कैसे लिख सकते हैं.भाषा ,प्रसंग आदि के अनुसार ही किसी चीज़
को सही से समझा जा सकता है।
ऐसे ही अंग्रेजी में एक बहुत प्रसिद्द कहावत को ही ले लें जो सभी को भ्रमित किए हुए है'-
'everything is fair in love and war'अगर इस विचारधारा का पालन किया जाए तो समाज में अव्यवस्था फ़ैल
जाएगी,नैतिकता नष्ट हो जाएगी और जिसको जो उचित लगेगा बलात हासिल करेगा।कानून व्यवस्था अर्थहीन हो
जाएगी।
अब बात करते हैं धार्मिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में,जहाँ कुछ अनुचित तर्क द्वारा उपजी अनुचित परम्पराएँ,प्रभु के
संदेशों को भी सही से नहीं समझ पा रही हैं।कुछ ऐसी कुरीतियाँ,अनावश्यक परम्पराएँ चली आ रही हैं जिन्हे किसी
भी धर्म में नैतिक या तार्किक नहीं कहा जा सकता।ये परंपरा है पशु बलि की। कोई भी धर्म किसी जानवर की हत्या
को कैसे नैतिकता या धार्मिकता से जोड़ सकता है।किसी भी जीव की हत्या अगर किसी भगवान को प्रसन्न कर रही है तो फ़िर वह भगवान ही क्या हुए.
अपने ही बनाये हुए मासूम जीवों की निर्मम हत्या से कोई भी सृजक या
कोई भी पिता कैसे खुश हो सकता है।ईश्वर चाहे किसी भी रूप में हो ,कहीं भी ,कभी भी किसी मासूम
जीव या प्राणी की हत्या,उसके शोषण ,उसके विनाश से प्रसन्न नहीं हो सकते।ये मनुष्य की विवेकहीन सोच मात्र है बस।
ईश्वर तो उसे पसंद करते हैं जो दयाशील,क्षमाशील,सहनशील और अहिंसक होता है।बलि देने से प्रभु के ख़ुश होने
की बात सोचना ही सर्वथा काल्पनिक है.
जो लोग ये समझते हैं की देवी माँ पशु बलि से प्रसन्न होती हैं तो वो इस भ्रम के पीछे छुपी वास्तविकता को समझने
का प्रयास करें।वास्तविकता में ये परंपरा बुद्धि के अल्प इस्तेमाल की वजह से ही शुरू हुई है।रक्तबीज जैसे राक्षस,
(जिसका रक्त भूमि पर गिरते ही एक नया राक्षस तैयार हो जाया करता था) इस समस्या के निवारण हेतु माँ ने
उसका रक्त पीना उचित समझा ताकि ऐसे और राक्षस न उत्पन्न हों और उनके भक्त कष्ट में न पड़े।बस इसका
मतलब सभी ने ये लगा लिया कि देवी माँ रक्त पिपासु हैं और शुरू हो गई बलि की प्रथा।
मांसाहार खाने के पीछे भी लोग ऐसे ही कुछ अर्थहीन तर्क देते हैं कि अमुक जानवर का मांस नहीं
खाया गया तो पृथ्वी पर इनकी संख्या बढ़ जाएगी,इस जानवर का ये बुरा हो जाएगा,वो हो जाएगा इत्यादि
कुतर्क,जबकि कारण होता है इनकी मांस भक्सी वृत्ति का,इन्हे बिना खाये अतृप्त रहना।अरे सृष्टि के संचालन का
जिम्मा तो ईश्वर के हाथों में है,तो किसे ज़िंदा रखना है ,किसे मारना है,कैसे मारना है ये सब उस पर छोड़
दो।
दूसरा कुतर्क कि हमें भी भगवान ने नुकीले दाँत (canine )दिए हैं शेर आदि की तरह तो इसलिए हमें मांसाहार
खाना चाहिए जबकि भगवान ने शेर आदि के ही ज़्यादा नुकीले दाँत इसलिए बनाये कि वह जानवर इसी तरह से
भोजन ग्रहण कर खुद को जीवित रख सकता है क्योंकि उसके पास विवेक,दया आदि ये सब भाव नहीं है।वह एक
जंगली प्राणी है।हम तो विकसित मानव सभ्यता के प्राणी हैं।
इसलिए पशु का कोई भी कर्म सज़ा के योग्य नहीं माना जाता है मगर इंसान विवेक-बुद्धि होते हुए भी जब ये कृत्य
करता है तो दंड का अधिकारी हो जाता है,प्रभु की दृष्टि में।
वैसे भी ये सब चीज़ें मनुष्य के लिए तो मानव सभ्यता के विकास से पहले के थीं,जब इंसानी सभ्यता पूर्ण विकसित
नहीं हुई थी,
उसे खाना बनाना आदि नहीं आता था,आग के आविष्कार से अनभिज्ञ था लेकिन सभ्यता और बुद्धि के पूर्ण विकास
के बाद भी अविकसित जैसा व्यवहार अपनाना ग़लत है.जीव खाने के लिए नहीं है प्रेम से पोषित करने के लिए
हैं,आपके द्वारा संरक्षित किए जाने के लिए हैं। कोई भी जानवर आपके खाने के लिए नहीं अपने 'चौरासी 'के कर्म
भोग हेतु उत्पन्न हुआ है इसलिए प्रकृति के विधान में भंग मत डालिए उन्हें अपना जीवन जीने दीजिये वरना अगले
जन्म में आप उसका आहार बनेंगे। लोग मांसाहार को लेकर न जाने क्यों भ्रमित बने हुए हैं।
अब इसी तरह शिवलिंग को लेकर लोगों का ज्ञान अल्प होने के कारण अल्प ज्ञान वाले लोग इसे सामान्यतः पुरुष
लिंग के रूप में समझ लेते हैं जबकि लिंग शब्द यहाँ संस्कृत अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ होता है प्रतीक या
चिन्ह। ये शिव का प्रतीक है। जैसे हिंदी व्याकरण में स्त्रीलिंग मतलब स्त्री का प्रतीक,पुल्लिंग मतलब पुरुष का
प्रतीक ।अगर लिंग शब्द का अर्थ प्रजनन अंग से ही जुड़ा होता तो दक्षिण में पुरुषों के सरनेम में लिंगा
स्वामी, रामलिंगम आदि न होता। सोच को परिमार्जित कर पवित्र दृष्टि से सोचा जाएगा तभी शिव लिंग का अर्थ
समझ आएगा।शिव को समझने के लिए पवित्र बुद्धि की ज़रूरत है क्योंकि शिव तो इन्द्रिय-निग्रह में इतने श्रेष्ठ हैं कि
जिन्होंने कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने के प्रयास की वजह से,अपने क्रोध से भस्म कर डाला था.शिव लिंग
तो शिव पुराण के अनुसार निराकार परब्रह्म का प्रतीक है,एक स्तम्भ रूप है। ये सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।आदि
भी यही हैं अंत भी यही हैं.वैसे भी हिन्दू संस्कृति में तो नारी और पुरुष विवाह के मूल में जो भाव है इसका
विशेष उद्देश्य मात्र सृष्टि की निरंतरता बनाये रखने में योग देना है न की स्थूल शरीर की तृप्ति।
इसमें विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है जिसमें नैतिक दायित्व,कर्तव्य और आत्मा-परमात्मा का भाव
प्रमुख है.यहाँ आत्मा प्रमुख है,शरीर गौण।आत्म-नियंत्रण और ईश्वरके प्रति आस्था और आत्मोथान की बात की गई है.
विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है जिसमें नैतिक दायित्व,कर्तव्य और आत्मा का भाव प्रमुख है.
इसीलिए हिन्दू धर्म में उम्र के अनुसार आश्रम व्यवस्था भी की गई है.मनुष्य विवेकशील होने के नाते अपनी ज़िंदगी
का मूल लक्ष्य या ध्येय स्पष्ट समझता है.यही चीज़ उसे पशुओं से अलग बनाती है।
अब ये स्पष्ट है कि किसी भी बात या घटना के पीछे छुपे तर्क को जानना ज़रूरी है और विवेक को इस्तेमाल करते
हुए हर बात का कारण भी।किसी भी चीज़ का अधूरा और ग़लत ज्ञान,किसी चीज़ के बिलकुल ज्ञान न होने से ज़्यादा
घातक है।
एक ही बात का अलग-अलग व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुसार अलग-अलग मतलब लगाते हैं और अल्प बुद्धि
वाले,ज्ञानवर्धक या हितकारी चीज़ को भी अहितकारी बना सकते हैं।हर धर्म मानवता,जीव प्रेम की शिक्षा देता है।
ईश्वर तो है ही वही है जो नेकी से पूर्ण हो,पूर्णतया दोष रहित हो,स्वं में सम्पूर्ण हो फिर कैसे वह किसी भी गलत काम
के लिए कह सकते हैं.इसलिए वास्तविक जीवन में कुछ भी अमल में लाने से पहले उसकी विवेक के साथ जांच
जरूर कर लें।
ग़लत जानकारी से उत्पन्न एक ऐसी ही और धारणा भगवान श्री कृष्ण को लेकर भी लोगों के मन में है जिसका
स्पष्टीकरण इन तथ्यों के बाद स्वं हो जाएगा। जो लोग ये मानते हैं कि कृष्ण तो 16 हज़ार रानियाँ रखते थे,वह तो
गोपियों के वस्त्र चुराया करते थे,तो ऐसे लोग अपनी बुद्धि से मलिनता को हटाकर स्वच्छ बुद्धि से इन वृतान्तों
को ध्यान से पढ़ें-
1.नरकासुर नामक एक राक्षस था जिसने अपनी शक्ति से सभी को परेशान कर दिया था।
तपस्या से प्राप्त वरदान का ग़लत फ़ायदा उठाकर उसने स्त्रियों,देवताओं अदि पर अत्याचार शुरू कर दिए थे।
उसने 16000 स्त्रियों को बंदी बना लिया था,परेशां होकर देवता कृष्ण जी की शरण में गए,कृष्ण जी ने उन्हें वचन
दिया कि वो उन सभी की रक्षा करेंगे। तब कृष्ण जी ने उस राक्षस का वध किया और16000 स्त्रियों को उसके चंगुल
से मुक्त करवाया लेकिन उन सभी स्त्रियों को उनके परिवार वालों ने अपनाने से मना कर दिया क्योंकि इतने समय
तक वो राक्षस की गिरफ़्त में थीं,अतः कृष्ण जी ने उन्हें अपनाकर उनको सम्मान प्रदान किया। ये है प्रभु श्री कृष्ण
जी की श्रेष्ठता,जो तुच्छ बुद्धि से समझी नहीं जा सकती।
2.वृतांत -कृष्ण जी के समय में प्रायः सभी गोपियाँ नदी में वस्त्र हीन होकर स्नान किया करती थीं क्योंकि उन्हें लगता
था कि स्नान के वक़्त बस वो सब ही वहाँ होती हैं और कोई नहीं होता। लेकिन प्रभु कृष्ण जी से कोई बात कहाँ छुपी
हो सकती थी। तो कृष्ण जी ने सोचा क्यों न इन्हे आज समझाया जाए कि इस तरह नदी में नग्न होकर स्नान करना
सही नहीं है। अतः एक दिन जब सभी गोपियाँ स्नान करने गईं तो कृष्ण जी वहीं पेड़ के ऊपर छुप कर बैठ गए और
उनके वस्त्र छुपा लिए,अब गोपियाँ परेशान हो गईं.इधर-उधर देखने लगी तभी कृष्ण जी ने ऊपर से वस्त्र गिरा दिए
और गोपियों द्वारा उनकी आलोचना और उलाहना पर,उन्होंने उन्हें समझाया कि इस तरह खुले स्थान पर स्नान
करना ग़लत है।यहाँ घूमने वाले ऋषि-मुनि,उड़ने वाले पक्षी,नदी में रहने वाली जल देवी,पूर्वज आदि नित्य-प्रति तुम्हें
ऐसे नहाते हुए देखते होंगे।तब गोपियों को अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कृष्ण जी से अपने अपराध
के लिए क्षमा माँगी।
उपर्युक्त जानकारी के बाद भी बाकी सारा निर्णय इंसान के स्व विवेक पर निर्भर है कि उसे क्या सही लगता है और
क्या ग़लत क्योंकि नेकऔर सिद्धांतवादी इंसान को कोई बरगला नहीं सकता और बुराई की राह पर चलने वाले को
सही मार्ग पर प्रभु के सिवा कोई ला नहीं सकता।
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अच्छा लिखा है
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