फ़िल्म निर्देशन और नैतिक दायित्व
आधुनिक युग में मनोरंजन के बहुत से साधन उपलब्ध हैं। इसमें फ़िल्मे,वीडियो गेम्स ,मोबाइल गेम्स,आदि विशेष
भूमिका रखते हैं. फिल्मों का तो समाज के हर आयु-वर्ग पर बहुत ज़्यादा प्रभाव पड़ता है।
फिल्म की कहानी, उसके गाने,उसके संवाद आदि सभी के मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव डालते हैं कि
बालक और युवा वर्ग तो अपने यथार्थ जीवन में कभी-कभी उसी के अनुरूप आचरण भी करने लगते हैं।
फ़िल्मों के फूहड़ गाने अक्सर किशोर और युवाओं की जुबां पर चढ़ जाते हैं.अक्सर वो इन्हे गुनगुनाते हुए मिल जाएँगे।
ऐसे ही फिल्मों में प्रयुक्त गालियाँ भी अधिकतर लोग अपना लेते हैं। फिल्म की कहानी का असर दर्शकों के दिलों -
दिमाग पर जो होता है,उसका पता भी हॉल में दर्शकों की विविध प्रतिक्रियाओं से हो जाता है.
आक्रोश वाली फिल्म से सबका आक्रोश में आकर आक्रामक प्रतिक्रिया देना,भावुक सीन देखकर आंसू बहा देना आदि...|
इसलिए एक फिल्म निर्माता की समाज के प्रति ये बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह सही
सन्देश वाली ,सामाजिकता और मानवतावादी विचारधारा से प्रेरित फ़िल्मों का अधिक से अधिक निर्माण करे।
आर्थिक लाभ से ज़्यादा देश और मानवता के हित की बात सोचे। बच्चों व युवाओं को हिंसक बनाने वाली व
सामाजिक या धार्मिक वैमनस्य फैलाने वाली फ़िल्मों का निर्माण बंद करे क्योंकि धार्मिक मतभेद आपसी प्रेम व
सौहार्द को ख़त्म कर देगा, साथ ही अगर बाल मन के समक्ष हिंसा-दुराचार वाली फ़िल्में परोसी तो कोमल मन पर
उनका ग़लत असर पड़ेगा।
गानों में शालीन भाषा इस्तेमाल हो.शब्द चयन अच्छा हो.नाम के लिए कुछ भी न लिख दें.कुछ भी संस्कृति
और सभ्यता को अपमानित करने वाला न हो।
अगर वैमनस्य और धार्मिक कट्टरता की राह राष्ट्र ने पकड़ ली तो सम्पूर्ण मानव सभ्यता ही नष्ट हो जाएगी।
अगर आप ये जानते हुए भी कि अमुक फिल्म की कहानी या गीत संस्कृति के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं ,
अपने आर्थिक लाभ के लिए उसे ओके कर देते हैं तो आप देश के प्रति अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं।
इसलिए देश की अखंडता व संस्कृति की रक्षा के लिए फ़िल्मों के निर्माण के वक़्त इन बातों का ध्यान रखें ,क्योंकि
अगर आप समाज को किसी भी तरीके से सुधारने में योगदान देते हैं तो आप देश और धर्म के प्रति अपना सही
दायित्व निभा रहे हैं अन्यथा नहीं।
यूँ तो ये व्यक्ति विशेष की अपनी बुद्धि पर निर्भर करता है कि वह किस चीज़ से क्या ग्रहण करता है क्योंकि एक
ही फिल्म देखकर एक व्यक्ति हिंसक बन जाता है और वहीं उसी फिल्म को देखकर दूसरा व्यक्ति हिंसा से नफ़रत
कर, एक महान संत और शांति का महा संदेशक बन जाता है।
लेकिन अधिकतर लोगों की बुद्धि किसी बात की गहराई को नहीं पकड़ कर उसके उथले पक्ष पर ही ध्यान केंद्रित
कर पाती हैं इसलिए अपना नैतिक दायित्व समझें और युवा पीढ़ी को देश की एकता और संस्कृति की रक्षार्थ आगे
बढ़ने हेतु उच्च -प्रेरणादायी दृश्य सामग्री परोसें।
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Best wishes
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