बेबस
मायूस से चेहरे को व्यंग की वेदना न दो
हंसी ही मिलती नहीं सबको, उन
खामोश निगाहों को विवशता की आहट न दो
डगमगाते क़दम कई बार संभाले हैं उसने
अब होश में आने पर
उपेक्षा के उसे धक्के न दो
रूठी हुई ज़िन्दगी को मनाता रहा था वो
आज ख़ुद से ही ख़फा है जब तो
अश्कों को उसके श़क की चेष्टा न दो
दर्द के भँवर में डूबी हैं उसकी सांसे
मुमकिन हो ग़र तुमसे
निर्दयता के उसे थपेड़े न दो ।
हंसी ही मिलती नहीं सबको, उन
खामोश निगाहों को विवशता की आहट न दो
डगमगाते क़दम कई बार संभाले हैं उसने
अब होश में आने पर
उपेक्षा के उसे धक्के न दो
रूठी हुई ज़िन्दगी को मनाता रहा था वो
आज ख़ुद से ही ख़फा है जब तो
अश्कों को उसके श़क की चेष्टा न दो
दर्द के भँवर में डूबी हैं उसकी सांसे
मुमकिन हो ग़र तुमसे
निर्दयता के उसे थपेड़े न दो ।
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