मेरी ग़ैरत को तेरे सामने झुकना ग़वारा नहीं
हो मशहूर कितना भी मग़र तू तो हमारा नहीं
दीवाने देखे हैं बहुत फ़टेहाल चाहत में हमने
दर व् दर ठोकरे 'मजनू' की सूरत में खाना
मोहब्बत के सागर का ये किनारा नहीं ।
नाज़ दिल पे है ग़ैरों की जुबां सुनी नहीं जिसने
जाए किसी के पास मकां की दहलीज़ पार कर
वफ़ा ए दिल को मंजूर कोई ऐसा सहारा नहीं ।
हो मशहूर कितना भी मग़र तू तो हमारा नहीं
दीवाने देखे हैं बहुत फ़टेहाल चाहत में हमने
दर व् दर ठोकरे 'मजनू' की सूरत में खाना
मोहब्बत के सागर का ये किनारा नहीं ।
नाज़ दिल पे है ग़ैरों की जुबां सुनी नहीं जिसने
जाए किसी के पास मकां की दहलीज़ पार कर
वफ़ा ए दिल को मंजूर कोई ऐसा सहारा नहीं ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed