भिखारी
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को हाथ में कटोरा लिए ,
दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हुए ।
कचरा -पात्र से किसी की फेंकी हुई पाव -भाजी की प्लेट को ,
भूख से व्याकुल चाटते हुए ।
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को
किसी सफ़ेद -पोश अभिमानी से मूक-वधिर की तरह पिटते हुए ।
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को तिरस्कार में भी मुस्कुराते हुए
अपनी बेचारगी में भी माँ को सक्षमता का अहसास कराते हुए
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को झोपड़ी की ओट में
ख़ुद के आंसू छुपाते हुए ।
रचनाकार -अंशु चौहान
दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हुए ।
कचरा -पात्र से किसी की फेंकी हुई पाव -भाजी की प्लेट को ,
भूख से व्याकुल चाटते हुए ।
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को
किसी सफ़ेद -पोश अभिमानी से मूक-वधिर की तरह पिटते हुए ।
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को ,
गरीबी से बेऔजार लड़ते हुएहाँ मैंने देखा है एक शख्स को तिरस्कार में भी मुस्कुराते हुए
अपनी बेचारगी में भी माँ को सक्षमता का अहसास कराते हुए
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को झोपड़ी की ओट में
ख़ुद के आंसू छुपाते हुए ।
रचनाकार -अंशु चौहान
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed